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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “जन्मभूमि की महिमा”

जन्मभूमि की महिमा

ऊंट कहीं पर भी मुड़ता जब ,
काठियावाड़ तरफ़ मुख होता ।
जन्मभूमि प्रति प्यार है ऐसा ,
कभी नहीं उसका सुख खोता ।।

जन्मभूमि चाहे जैसी हो ,
प्राणों से प्रियतर वह होती ।
याद हृदय तड़पा देती है ,
नयनों से झरते हैं मोती ।।

जन्मभूमि की प्यारी खुशबू,
जीवन को महका देती है ।
स्वर्गिक सुख फीके पड़ जाते,
चिड़िया को चहका देती है ।।

वर्षा,शीत,तपन कुछ भी हो ,
उससे मधुमय रहता नाता ।
रग, रग में पुकार है उसकी ,
उसके बिन ना जगत् सुहाता ।।

विदेश यात्रा पूरी कर जब ,
विवेकानंद जी भारत आए ।
पग रखते ही फफक पड़े थे ,
जन्मभूमि को शीश नवाए ।।

कितना कष्ट होता है उनको,
प्रथम बार जो घर को छोड़ें ।
आंखों में आंसू होते हैं ,
बार, बार अपने मुख मोड़ें ।।

माता, पिता,सगे सम्बन्धी ,
टुकुर, टुकुर देखा करते हैं ।
जिन पर गुजरी, वे ही जानें ,
मन मसोस, आहें भरते हैं ।।

किंतु विवशता है जीवन की,
जीवन हित मरना पड़ता है ।
अपना नीड़ सभी को प्यारा ,
राही खुद से ही लड़ता है ।।

स्वर्णमयी लंका को तजकर,
राम अयोध्या वापस आए ।
सर्वविदित है राम कहानी ,
सबको जीभर गले लगाए ।।

जन्मभूमि की महिमा क्या है,
जो बाहर रहते, वे जानें ।
आंसू छिपा, काम करते हैं ,
कोई मानें या न मानें ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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