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सुर साधिका,स्वर कोकिला

स्वर साधिका स्वर कोकिला
भारत रत्न तुम्हें नमन।
हृदय व्यथित बह रहे अश्रु
धार भीग उठे हैं नयन।।

कंठ सरस्वती धारे आज होने
जा रही हो पंचतत्व में विलीन।
मृदुल मधुरिम वाणी से सदा अमर
रहोगी,जग आज है गमगीन।।

सप्त स्वर धारिणी स्वर में
अमृत लिए तुम झंकार थी।
छोड़ चली जग,स्वर्ग पथ पर बढ़
चली,संगीत की करुण पुकार थी।।

शृंगार, करूण, वीर, शांत
रसों से अद्भुत सुर थी सजाती।
वीरता के भाव संग नेह
विरह भी तुम थी खूब गाती।।

वाणी से जग था अचंभित, तुम्हारी
आवाज थी तुम्हारी पहचान।
सच पूछो तो सरस्वती तनया तुम
भारत की थी आन बान शान।।

शत-शत श्रद्धा सुमन
अर्पित करती हूँ तुम्हें आज।
भावों के पुष्प चढ़ाती हूँ,
देश को तुम पर है नाज।।
__________________________✍🏻

नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ.ग.)

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