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कहानी : कुंजेश्वर और स्वर्ण हांडी

यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो आम इंसान है लेकिन उसने अपने मेहनत से खुद को खास बना लिया। उसके अंदर ऐसी दैविक शक्ति समाहित थी जिससे वह स्वयं अनजान था लेकिन उसमें सबसे बड़ी कमजोरी थी जिद्द। इतना जिद्दी था कि जब तक उसे संतोष जनक उत्तर ना मिले वह मानता भी नहीं था। उसके जीवन में कई उतार चढ़ाव थे जिसे धीरे धीरे जानेंगे। यह कुंजेश्वर कि सत्य घटना पर आधारित कहानी है। लोगों को अचंभा होगा मगर ये बस 30 वर्ष पहले की ही कहानी है जो अचरज और दिव्य ताकतों से भरी जादुई कहानी है।
कुंजेश्वर के जीवन में कई कथाएं है जो हैरत अंगेज है यह कथा कुंजेश्वर और हांडी की कहानी है। हांडी जो सोने के सिक्कों से भरी थी जो एक , दो या तीन नहीं नौ थी। इन हांडियों की स्वामिनी भी थी दिव्य यक्षिणी।
कुंजेश्वर एक साधारण इंसान था उसका एक परिवार था। वह अपनी पत्नी और पांच बच्चों के साथ जीवन यापन करता था। उसके पास सरकारी नौकरी भी थी इसलिए पैसों की कमी नहीं थी लेकिन पैसों के लिए उसने दुख जरूर झेला था अपने बचपन में जिसकी कथा कभी और बताएंगे। कुंजेश्वर जिस जगह काम पर जाया करता था वह काफी जंगली इलाका था। ज्यादा बड़ी बस्ती नहीं थी कुछ सरकारी क्वार्टर थे। मुख्य नगर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा यह छोटा नगर कहे या गाँव, चकाचौंध से दूर था। वैसे भी वर्तमान समय के मुकाबले उस समय सुविधा कम ही थी।
कुंजेश्वर को पढ़ने का और कुछ नया करने का बहुत शौक था। वह इसी शौक के कारण आयुर्वेद चिकित्सक की पढ़ाई और पत्रकारिता की पढ़ाई नौकरी करते करते ही पूरी कर ली। किंतु वह सरकारी नौकरी में था तो चिकित्सा और पत्रकारिता का काम उसने नहीं किया। नौकरी से समय मिलने पर वह वहाँ के लोगों का इलाज करता था क्योंकि उस समय आसपास के इलाके में डॉक्टर ना के बराबर थे इसलिए कुंजेश्वर उनकी सहायता करता था। कुंजेश्वर के पास हर प्रकार की किताबें थी। पुराणों से लेकर कई महापुरुषों की जीवनी और लेखन वाले किताबों कि पूरी लायब्रेरी थी उसके पास। उसने योग और जाप भी सीखा। वह हनुमान जी का परम भक्त था और रोज जाप भी करता था जिससे धीरे धीरे उसके पास कुछ शक्तियां भी आ गयी जिसका उसे ज्यादा ज्ञान नहीं था।
उसका जीवन बस यूं ही चल रहा था। तभी उस इलाके में एक अघोरी आ कर रहने लगा और रात के अंधेरे में शमशान में जा कर तप करने लगा। पहले वहां के लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे, मगर कुछ दिनों बाद शमशान में प्रतिदिन नीबू और रक्त के छीटें दिखने लगे। वहां पर रात भर तंत्र मंत्र की क्रिया होने के सबूत रहते थे। लोग अघोरी से अब डरने लगे कि यह क्या कर रहा है मगर अघोरी के मन में एक गहरा राज था जिसे हर कोई अनजान था। अघोरी से सभी दूर दूर रहने लगे। चालीस दिनों तक अघोरी ने अपनी क्रिया की इस बीच किसी भी जनता को कोई नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि अघोरी का तप किसी का नुकसान नहीं बल्कि अपना फायदा था। दरसअल अघोरी को ज्ञात हो चुका था कि इस गाँव में एक ऐसी जगह है जहाँ सोने से भरी हांडियां है उन हांडियों को पाने के लिए ही अघोरी ये क्रिया कर रहा था। क्रिया तो पूर्ण होगयी किंतु अकेले इतना धन निकालना उसके बस की बात नहीं थी इसलिए उसने तीन और लोगों को अपने दल में लालच देकर शामिल किया वे भी लोभ वश उसकी बातों में आ गए। वे सभी रात्रि के दूसरे पहर होते ही हांडी ढूंढने लगे तीन दिन बीत गया किंतु उनके हाथ कुछ नहीं आया। अघोरी ने हार नहीं मानी और फिर तप पर बैठ गया कि आखिर क्या वजह है जो उन्हें यह दौलत प्राप्त नहीं हो रही। तब उसे पता चला कि इस हांडियों की रक्षा एक यक्षिणी करती है जैसे ही अघोरी हांडियों तक पहुँचता हंडियां वहाँ से गायब हो जाती । अघोरी ने पुनः रात्रि को अपने साथियों के साथ हांडियों को प्राप्त करने की कोशिश की । इस बार यक्षिणी प्रत्यक्ष रूप में आयी और उससे युद्ध करने लगी। यक्षिणी की ताकत से अघोरी आहत हुआ वह अपनी जान तो बचा लिया किंतु उसका एक साथी मारा गया। एक आदमी की रहस्यमयी मौत से लोग डर गए। बात आगे ना बढ़ जाये यह जान कर अघोरी ने हांडियों को पाने का लालच कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया। वह नहीं चाहता था कि लोगों को इस बारे में पता चले कुछ महीने बीतने के बाद अघोरी के मन में पुनः हांडियां हासिल करने का विचार उमड़ा लेकिन इस बार यक्षिणी भी ताकतवर हो गयी थी। वह भी अघोरी की मंशा भाँप गयी थी। अब यक्षिणी हर रात पहरा देती और जंजीरों में जकड़ी हांडियों के चलने की आवाज अब आम लोगों को भी सुनाई देने लगी। गांव में डर का माहौल बन गया। अघोरी ने अपनी मंत्र शक्तियों से यक्षिणी को बस करना चाहा पर हर बार विफल रहा।
एक दिन शाम के समय किसी ने कुंजेश्वर का द्वार खटखटाया। कुंजेश्वर ने दरवाजा खोला बाहर अघोरी था। अघोरी को देख उसने पूछा वह यहाँ क्या कर रहा है। अघोरी ने उसे साथ चलने को कहा। कुंजेश्वर उसके साथ जाना नहीं चाहता था किंतु अघोरी से घर पर बात करना भी उसे सही नहीं लगा। वह उसके साथ चलता है। कुंजेश्वर ने कहा क्या हुआ आप यहां क्यों आये मुझे कुछ समझ नहीं आया। अघोरी ने कहा कि उसे मदद चाहिए। कुंजेश्वर ने कहा वह भला क्या मदद करे यदि अस्वस्थता थी तो घर पर ही कह देते इलाज कर देता। अघोरी ने कहा कि वह उसके साथ उसके घर चले वहीं सब बताएगा। दोनों अघोरी के घर आते हैं अघोरी कुंजेश्वर को हंडे और यक्षिणी से जुड़ी बात बताकर उससे मदद मांगता है। कुंजेश्वर उसकी बात सुन उसकी मदद से मना कर देता है, वह कहता है कि किसी और का धन लेना सही नहीं चाहे इंसान हो या आत्मा। अघोरी कहता है अब बात धन की नहीं रही मेरे कारण यक्षिणी रोषित हो गयी है जो लोगों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
कुंजेश्वर कहता है कि इसमें मैं क्या कर सकता हूँ मैं तंत्र मंत्र नहीं जानता यह मुझसे संभव नहीं हो पायेगा। अघोरी ने कहा कि इस समस्या के निवारण के लिए मैंने ध्यान किया तब मुझे पता चला कि तुम हनुमानजी के परमभक्त हो और उनकी कृपा भी तुम पर है। तुमसे ही कुछ हल निकलेगा यही विश्वास से तुम्हारे पास आया हूं। अगर तुमने सहायता नहीं कि तो शायद फिर किसी के प्राण संकट में आ सकते हैं। अब कई और लोग भी इस राज को जान चुके हैं यदि अब किसी ने फिर हंडा चुराया तो वह बच नहीं पायेगा और इस पाप का भागी भी शायद मैं ही होऊंगा। कुंजेश्वर कुछ पल विचार करता है और कहता है ठीक है आज रात ही हम वहां चलेंगे। तुम अपने कुछ साथी अपने साथ लेकर आना। अघोरी कहता है कि यदि हम वहां गए तो वह मार डालेगी। कुंजेश्वर बड़े आत्मविश्वास से कहता है कि जब मेरे गुरुजी (हनुमानजी) मेरे साथ है तो किसी को कुछ नहीं होगा। अघोरी अपने तीन साथियों और कुंजेश्वर के साथ वहाँ जाता है। सभी वहां यक्षिणी की खोज करते हैं पर उस स्थान पर ना यक्षिणी मिलती है ना हंडा। पूरी रात खुदाई की जाती है पर वहां किसी का आभास ही नहीं होता। किसी को समझ नहीं आता कि यदि यक्षिणी उग्र रूप में थी तो सामने क्यों नहीं आयी। सभी वापस आ जाते हैं। दूसरी रात्रि पुनः सभी जाते हैं लेकिन आज भी शांति कायम थी। अब कुंजेश्वर ईश्वर से प्रार्थना करता है और यक्षिणी को बुलाता है। तभी ढ़ेर सारी स्वर्ण से भरी हांडियों की आवाज आती है साथ ही वे जंजीरो में बंधी आगे बढ़ती भी दिखाई देती है। जंजीरों में बंधी हांडी की आवाज तेज और तेज होने लगती है। फिर एक स्त्री के हसने की आवाज आती है वह हँसते हुए कहती है कुंजेश्वर जितना चाहो उतना स्वर्ण ले लो और यहाँ से चले जाओ मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊंगी। कुंजेश्वर कहता है कि मुझे धन नहीं चाहिए। यक्षिणी कहती है धन नहीं चाहिए तो मुझे क्यों परेशान कर रहे हो। मुझे नहीं जानते तुम्हारे पूरे वंश को नष्ट कर सकती हूँ। कुंजेश्वर कहता है जब तक मेरे गुरुजी साथ है कोई मेरा बाल बांका नहीं कर सकता। अच्छा ये बताओ तुम धन क्यों दे रही हो इसके बदले में तुम्हें क्या चाहिए। यक्षिणी धन के बदले इस अघोरी की मृत्यु इसने मुझे नरक से धरती पर आने को विवश किया। मुझे पकड़ने और धन पाने की कोशिश की। इसलिए तुम धन ले लो और इसे मेरे सुपुर्द कर दो। उसकी बातें सुन अघोरी और उसके साथी डर जाते हैं। अघोरी कहता है कि लोभ के कारण उसने ऐसी गलती की वह उसे माफ कर दे। यक्षिणी तीव्र अट्हास करती हैं नहीं मुझे माफ़ करना नहीं आता और यह कह कर अपना हाथ उठती है। सभी हवा में उड़ने लगते हैं। कुंजेश्वर कहता है कि यह मेरी शरण में है मैं इसे और इसके साथियों को कुछ नहीं होने दूंगा। यह कह वह अपने इष्ट का जाप करने लगता है। यक्षिणी पुनः अपनी पूरी शक्ति लगाकर सबको मारने का प्रयास करती है लेकिन उसका वार खाली जाता है। एक अदृश्य दिव्य शक्ति उन्हें बचा लेती है। यह अनदेखी ताकत श्री हनुमानजी की थी जो दिख नहीं रही थी पर सभी महसूस कर रहे थे। उस अद्वितीय ताकत के सामने यक्षिणी हार मान लेती है और कहती है कुंजेश्वर मुझे नहीं पता था कि तुम जैसा साधारण इंसान मुझे हरा पायेगा। यक्षिणी एक साधारण कन्या का रूप धारण कर अपने हाथों में राखी लिए कुंजेश्वर के पास आती है और उसके हाथों में राखी बांध देती है। अपने हाथों में राखी बंधा देख कुंजेश्वर कहता है कि तुमने मुझे राखी बांधा है इसलिए अब तुम्हारी रक्षा मेरा धर्म है किंतु यदि तुम यहाँ पर रही तो लोग लोभ वश यहाँ आएंगे और तंग करेंगे। यदि तुमने भी उन्हें हानि पहुंचायी यह भी ठीक नहीं होगा इसलिए तुम ही कोई उपाय बताओ कि किसी का अहित ना हो। अगर तुम चाहो तो तुम्हारी मुक्ति दिलाने में मैं सहायता कर सकता हूँ। यक्षिणी कहती है जब तक इन हांडियों का उत्तराधिकारी नहीं आएगा मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी इसलिए मैं सभी को साथ लेकर पुनः रसातल में चली जाती हूँ और तुम स्थान पर मंदिर बना देना जिससे लोग स्वर्ग के लालच में यहाँ खुदाई ना कर पाए और भक्ति में लीन रहे जिससे यहां की नकारात्मकता भी चली जायेगी और मेरा समय आएगा तो मुझे मुक्ति भी मिल जायेगी, लेकिन भैया आप अपने इष्ट को कहें की मुझे प्रताड़ित ना करें। कुंजेश्वर अपने गुरुजी से प्रार्थना करता है और यक्षिणी को वचन देता है। यक्षिणी वहां से रसातल में चली जाती है। अघोरी अपने कर्मों के पश्चाताप के लिए उस स्थान पर मंदिर निर्माण करता है उसके साथी भी इस कार्य में सहायता करते हैं। मंदिर निर्माण कर अघोरी कई वर्षों तक वहां पूजा करता है। फिर कभी यक्षिणी ना दिखाई देती है ना ही स्वर्ण हांडियों का पता चलता है। लेकिन कुंजेश्वर के जीवन की रहस्यमय कथाएं यहीं समाप्त नहीं होती उसके जीवन में अभी कई अदभुत चमत्कारों का होना बाकी है। कुंजेश्वर की कथा में इसके बाद जानेंगे कैसे एक मृत बच्ची पुनः जीवित हो गई। कुंजेश्वर और नया जीवन

– गायत्री साहू

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