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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “टी, वी, देखना बंद”

टी, वी, देखना बंद

टी, वी, देखना बंद हमने किया है,
नहीं कार्यक्रम कोई , अब है सुहाता ।
सुबह,शाम बस है लड़ाई व झगड़ा,
बचाए हमें आज आकर विधाता ।।

नहीं कोई सार्थक बहस आज होती,
सभी पार्टियां बस हमें हैं रिझातीं ।
बहुत भेद कथनी और करनी में है सच,
तदपि तर्क़ से निज, हमें नित मनातीं ।।

घिसे पिटे संवाद, गीतों से सिरियल्स ,
कराते घरों में सहज ही लड़ाई ।
निरर्थक बिछा जाल विज्ञापनों का,
कहां से करें आज़ उनकी बड़ाई ।।

व्यथित है हृदय,देख जीवन की झांकी,
रसातल में आदर्श हैं आज सारे ।
बिकाऊ है हर चीज़ जो आज़ दिखती ,
बचा लो हमें, मूल्य निशि दिन पुकारे ।।

सभी न्यूज चैनल दिखाते वही हैं,
जिसे मान्यता आज़ सरकार देती ।
हकीकत बहुत दूर होती है सच से,
लगे आज़ सब,मानो घर की हो खेती ।।

नहीं भेद कोई शहर, गांव में अब,
मिली आज विद्युत की सुविधा यहां है ।
टी, वी, और मोबाइल, घरों में सुलभ है,
नकारात्मक सोच जगती जहां है ।।

बढ़े जा रहे जुर्म टी, वी,निरखकर ,
घरों में महाभारत की है क्रीड़ा ।
सभी त्रस्त हैं,सोच आती कहां से,
कठिन है बहुत, यह ज़मानें की पीड़ा ।।

विमुख हो पढ़ाई,लिखाई से बच्चे,
भ्रमित हो, दिवास्वप्न में आज उलझे ।
नहीं जानते, झूठी टी, वी, की दुनियां ,
जीवन की समस्या, भला कैसे सुलझे ।।

अच्छाई, बुराई तो हर चीज़ में है,
सकारात्मक सोच रक्खें सदा हम ।
नहीं कोई ग़लती है टी, वी, की इसमें,
विचारें ज़रा और मिटाएं स्वयं ग़म ।।

देखें कार्यक्रम जिससे जीवन सफल हो,
दिखाए जो सन्मार्ग की पूण्य धारा ।
मिले रोशनी इस गहन तम में यारों ,
सही मायने में हो जीवन सहारा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

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