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मार्कण्डेय त्रिपाठी पंक्ति “गृहलक्ष्मी की महत्ता”

गृहलक्ष्मी की महत्ता

गृहलक्ष्मी के सिर पर रहता ,
घर का सारा भार है ।
घर बनाती वह मकान को ,
उसकी कीर्ति अपार है ।।

चौका बर्तन,साफ सफाई ,
चाय नाश्ता और भोजन ।
सब कुछ है उसके कंधे पर ,
तदपि नहीं खुश रहते जन ।।

कामवाली बाई आती तो ,
लेती घर से दस हजार ।
गृहिणी बचत करे पैसों की,
और लुटाती रहती प्यार ।।

सारी हेकड़ी बंद हो जाती ,
अगर कभी वह पड़े बीमार ।
सबके मुंह सूख जाते हैं ,
नहीं सूझता कुछ भी यार ।।

जब से वह घर में आई है ,
गुजर गए हैं कितने साल ।
सोचो, कितनी बचत हुई है,
ज़रा करो तुम उसका ख्याल ।।

व्यंग्य बाण मत मारो उस पर,
नहीं वह घर की नौकरानी ।
त्याग, तपस्या की वह मूरत ,
कठिन है उसकी जिंदगानी ।।

बिना वेतन के काम कर रही ,
किया है हर पग पर सहयोग ।
भले पुरुष कितना भी कमाए,
बचत कला नारी का योग ।।

कभी नहीं फुर्सत है उसको,
करती रहती घर के काम ।
कभी तो उसकी पीड़ा समझो,
उसे भी चाहिए कुछ आराम ।।

पुरुष को बाहर की सुध रहती ,
पर,घर की नारी करती ।
शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रगति उसके सिर,
घर के हित निशि दिन मरती ।।

वह तो मात्र प्यार की भूखी ,
बस इतना कर दो उपकार ।
बुलबुल होती वह तारीफ़ सुन,
होता नारी हृदय उदार ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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