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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “बाबा की महत्ता”

बाबा की महत्ता

जवानी का अभिमान था आज तक जो,
वह भी बाबा बनकर बिखरने लगा है ।
हुआ आज अहसास बूढ़ा हुआ मैं ,
बहुत हो चुका,मन निखरने लगा है ।
जगा आज वैराग्य मन में अचानक ,
जीवन शेष प्रभू प्रति थिरकने लगा है ।
अंतिम सत्य दिखाई पड़े नित ,
माया का पर्दा खिसकने लगा है ।।

गुजराती में बा माता को कहते ,
दो माताओं का प्यार देते नित बाबा ।
मूल से ज्यादा है ब्याज की चाहत ,
ब्याज को देख खिले मुख आभा ।
बचपन की सुधि बाबा को आवै ,
सुनाते कहानी और किस्से हैं बाबा ।
बाबा बनें बहु भाग्य से लोग ,
तरें पुरखे,नित गावत बाबा ।।

बच्चों के मन में जो प्रश्न जगें ,
उनको नित ही सुलझाते हैं बाबा ।
अच्छे,बुरे की है क्या पहचान ,
सदा मृदु बैन बताते हैं बाबा ।
रिश्ता अटूट है बच्चों से ,
नित प्यार सुधा बरसाते हैं बाबा ।
बाबा को तो बस बाबा ही जानें,
भला कोई और बुझे कस बाबा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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