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पुनरुत्थान

अंतरंग वार्ता में
मैं परास्त हुई
अपेक्षाएं हावी थीं मुझ पर
आकांक्षाएं भी थीं
क्या महत्वकांक्षी होना
अभिशाप है
विषयों से आसक्ति
विषय भिन्न है
मेरे लिए
स्वयं के आकलन में
देखा मैंने
भोगा है संसार को
पर मैं योगिनी भी हूॅं
छल किया नहीं
परन्तु
मैं अछूती भी नहीं
मिथ्याचरण से
मैं मौन रही
धर्म की हानि पर
परन्तु मैं अधर्मी नहीं
मैंने सही असहनीय पीड़ाएं
मैंने शोषक नहीं
मैं स्व के अध्ययन में रत रही
मैंने संसार समझा ही नहीं
मैं नासमझ हूॅं
अनगढ़ हूॅं
अविरत हूॅं
परन्तु तत्पर हूॅं
पुनरुत्थान के लिए
हे दिव्यता !
संगच्छत्वम्

रजनी साहू ‘सुधा’

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