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कवि मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति संत हृदय

संत हृदय

सुख, दुख में समान स्थिति ही ,
संत हृदय का शुभ लक्षण है ।
किसी से कुछ भी नहीं शिकायत,
बस सात्विक भोजन भक्षण है ।।

सोना पड़े पलंग पर उनको ,
या जमीन पर ही सोना हो ।
भरी हुई हो मधुमय थाली ,
भाग्य में या पत्तल,दोना हो ।।

रुचिकर भोजन मिले कहीं पर,
रूखा, सूखा या भोजन हो ।
कर लेते स्वीकार सभी कुछ ,
रोटी हो अथवा ओदन हो ।।

नमक पड़ा हो कम या ज्यादा,
भोजन हो मीठा या तीखा ।
साम्य भाव रखते वे सब में,
सब कुछ लगता एक सरीखा ।।

चाय समय से मिली, ठीक है,
नहीं मिली तो भी वे खुश हैं ।
सहज रूप में जीते हैं वे ,
निज मन पर रखते अंकुश हैं ।।

भले ही बड़ बड़ करे लुगाई,
असर नहीं कुछ भी होता है ।
अपने में खोए रहते हैं ,
वे जगते,जब जग सोता है ।।

पता नहीं, क्या लिखते, पढ़ते,
कभी स्वयं से बातें करते ।
किधर, कहां,कब, क्यों जाते हैं,
कोई न जानें, कहां ठहरते ।।

दुनियां भर की चिंताओं से,
नाहक परेशान से लगते ।
अपनी कोई फ़िक्र न होती,
आंख मूंदकर भी हैं जगते ।।

कैसे कपड़े कहां पर पहनें,
इसकी कुछ परवाह न होती ।
जो भी मिला, पहनकर चलते,
पैंट शर्ट या कुर्ता धोती ।।

रह जाते लुंगी,बंडी में ,
मन में कुछ भी नहीं दिखावा ।
कहते, किसको दिखलाना है,
भाता है सारा पहनावा ।।

जीवन दर्शन भरा हृदय में ,
ज़रा कुरेदो, फिर कहते हैं ।
उनका मौन बहुत कुछ कहता,
पर पीड़ा सहते रहते हैं ।।

अक्सर उनके नयन कोर से,
अश्रु बिन्दु बाहर आ जाते ।
भावुकता उर में रहती है ,
खुद अपने पर ही मुस्काते ।।

कोई प्रशंसा करे या निन्दा,
उन पर कोई फर्क न पड़ता ।
इन सबसे ऊपर हैं वे सच ,
उन पर दूजा रंग न चढ़ता ।।

बाहर वे जैसे दिखते हों ,
पर भीतर की छटा निराली ।
शुभ चरित्र जीवन की पूंजी,
भले तिजोरी रहती खाली ।।

वे भाषण, प्रवचन ना करते,
पर , जीवन सब कुछ कह देता ।
वे ही सच आदर्श हमारे ,
वे ही सत् समाज के नेता ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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