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कवि मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति बदलता परिवेश

बदलता परिवेश

बेटा रहता अमेरिका में ,
बहू जर्मनी में रहती ।
बिटिया रूस गई है पढ़ने,
बुढ़िया मां सबसे कहती ।।

हम दोनों भारत में रहते,
पति हैं अब सत्तर के पार ।
थोड़े दिन की शेष जिंदगी,
जीवन अब लगता है भार ।।

बच्चों के भविष्य के खातिर,
क्या, क्या हमने कष्ट सहे ।
वृद्धावस्था सुखमय होगी ,
सबसे हम सब यही कहे ।।

पेंशन ही है आज सहारा ,
गिद्ध दृष्टि उस पर भी है ।
ले जाओगे क्या ऊपर सब,
रहने को तो घर भी है ।।

कुछ दिनों तक हाल चाल थी,
अब तो वह भी बंद हुई ।
क्या करते हैं,कब आएंगे ,
नहीं पता,मति मंद हुई ।।

आस पास के लोग पूछते ,
कोई कमी हो,कह देना ।
हमको ही अब अपना समझो,
उनको तुमसे क्या लेना ।।

हमको वे दिन याद आ रहे,
घर में थीं खुशियां भरपूर ।
बेटे, बेटी बड़े हुए तो ,
आज हो गए हमसे दूर ।।

और अधिक पैसे की चाहत,
से उजड़ा सुखमय संसार ।
किसको दुखड़ा आज सुनाएं,
बिखर गया सारा परिवार ।।

कौन अपने हैं, कौन पराए,
क्या है इसकी परिभाषा ।
कुछ भी समझ नहीं आता है,
मरी आज जीवन आशा ।।

ऐसे हैं परिवार अनेकों ,
जिनकी यही दशा है आज ।
हर सम्बन्ध स्वार्थ केन्द्रित है,
बिलख रहा है स्वस्थ समाज ।।

मात, पिता हैं वृद्धाश्रम में ,
घर में लगा हुआ ताला ।
बदल गया परिवेश आज का,
सब कुछ है गड़बड़झाला ।।

बहुत घरों में नौकर रखकर,
बच्चे होते लापरवाह ।
नौकर देखें वृद्ध जनों को,
असहनीय है उनकी आह ।।

मन की बात कहें वे किससे,
घुटन भरा होता जीवन ।
नौकर से हर बात न होती,
इंतज़ार करते हर क्षण ।।

जोड़ी में एक चला गया तो,
हो जाता है जीवन भार ।
धन, दौलत कुछ काम न आवै,
शून्य लगे सारा संसार ।।

पैसा है साधन जीवन का,
कभी नहीं हो सकता साध्य ।
भटक गए क्यों चकाचौंध में,
छोड़ दिए अपने आराध्य ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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