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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “विश्वकर्मा पूजा”

विश्वकर्मा पूजा

हे इस जग के शिल्पकार प्रभु ,
बारम्बार तुम्हें वंदन है ।
आज विश्वकर्मा पूजा है ,
तेरा बहुविधि अभिनन्दन है ।।

अपने औजारों को हम सब ,
पूजित करके बहुत अघाते ।
आदिस्रोत हो तुम रचना के ,
पूज्य भाव रख शुचि गुण गाते ।।

तुमसे ही प्रेरणा प्राप्त कर ,
चलती हैं जागतिक दुकानें ।
नई, नई चीजें बनती हैं ,
प्रगतिशील रहते कारखानें ।।

हथियारों की पूजा होती ,
गाड़ी को भी खूब सजाते ।
मंगल गान होता है घर में ,
पा प्रसाद अद्भुत सुख पाते ।।

विश्व कर्ममय रहता तुमसे ,
चलती तुमसे रोजी, रोटी ।
भूल,चूक को क्षमा करो प्रभु,
मानव बुद्धि बहुत है छोटी ।।

स्वर्णमयी लंका को तुमने ,
निज प्रतिभा से खूब सजाया ।
मित्र सुदामा की कुटिया को,
महल रूप दे,जग हरसाया ।।

अद्भुत कला छिपी है तुम में ,
हम पर कृपा बनाए रखना ।
यही प्रार्थना है हम सब की ,
इससे अधिक नहीं कुछ कहना ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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