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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “उर्मिला वियोग”

उर्मिला वियोग

बरसती थीं आंखें,विकल उर्मिला थी ,
गये छोड़ मुझको, मेरे प्राण प्यारे ।
गरजते हैं बादल, चमकती है चपला ,
न जानें कहां होंगे प्रियतम हमारे ।।

महल में पड़ी, मौन स्वर में बिलखती ,
रही हूं सदा,पीर अपनी छुपाए ।
मुझे भी तो वे याद करते ही होंगे,
मगर क्या करें, अश्रु नयनों में छाए ।।

है वर्षा का मौसम, बोलें मोर, दादुर ,
नहीं स्वर सुहाता, कठिन है परीक्षा ।
बही भावनाओं की शुचि धार उर में,
सिसकती रही उर्मिला की सदिच्छा ।।

प्रभू साथ हैं, फिक्र कुछ भी नहीं है,
मगर क्या करें,मन की बातें निराली ।
जो अपनों के प्रति सोचता कुछ अलग है,
नहीं उर मिला, उर्मिला बात टाली ।।

नहीं उर्मिला, तुम संभालो स्वयं को,
रोको अश्रु धारा, यह आवाज आई ।
मगर कवि स्वयं रो पड़ा इस विरह से ,
थमी लेखनी,धुंध नयनों में छाई ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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