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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “सीता जी की व्यथा”

सीता जी की व्यथा

जो धरती से निकली,जनक पोषिता थी ,
मिला राम सा वर, जगत् मां कहाती ।
बनी जिनकी शादी थी छत्तीस गुणों से ,
कहां सुख मिला, अश्रु ढर,ढर बहाती ।।

विधाता का लेखा कोई पढ़ न पाया,
नहीं ज्योतिषी कोई अब तक सफल है ।
बहुत है कठिन काल निर्णय की गणना,
सभी भोगते कृत् कर्मों का फल है ।।

नहीं देवता भी बचे हैं नियति से ,
तो मानवों में वह क्षमता कहां है ।
सदा मुंह चिढ़ाती, नियति है सभी को,
सभी नाचते, जो भी रहता जहां है ।।

सभीता थीं सीता, बिलखती थीं मन में,
इधर राम की भी दशा अति विकट थी ।
कहां से कहें उनका सुखमय था जीवन,
हमारे लिए मौत अति सन्निकट है ।।

भले हम कहें, सीता भू में समाईं,
सही मायने में वे कहीं आत्महत्या ।
नहीं सह सके राम पीड़ा विरह की,
लिए जल समाधि, जो थी खुद की हत्या ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

 

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