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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “वर्षा ऋतु”

वर्षा ऋतु

चढ़ गया आषाढ़ देखो ,
नभ में पसरी हैं घटाएं ।
बादलों की कोख से ,
प्रस्फुटित चपला की कलाएं ।।

तप्त धरती को मिली
शुचि शांति, सौंधी महक छाई ।
मगन है प्रकृति नटी ,
मुस्का रही , पड़ती दिखाई ।।

पंकमय हैं रास्ते ,
फिसलनभरी सड़कें हुई हैं ।
संभलकर चलना सखे ,
घन कालिमा धरती छुई है ।।

खुल गए स्कूल, बच्चे
भीग रहे, लेकर भी छाता ।
रेन कोट भी व्यर्थ है ,
बच्चों को यह मौसम सुहाता ।।

मोर, दादुर और पपीहे ,
गा रहे अद्भुत तरानें ।
मगन हैं संयोगी जन ,
ढुढ़ते हैं मिलने के बहानें ।।

चतुर्मास प्रारंभ है ,
साधक भ्रमण करना हैं छोड़े ।
टिककर करते हैं तपस्या ,
भले आएं कितने रोड़े ।।

कृषकजन अति मगन हैं ,
होती है धानों की रोपाई ।
होती है अद्भुत छटा ,
जब गीत कजरी दे सुनाई ।।

भीगकर बच्चे इकट्ठा
कर रहे, देखो बनौरी ।
चल रही ठंडी हवा ,
और चू रही हो मगन ओरी ।।

उड़ रहे हैं अब पतंगे ,
बनकर दीपक के दिवानें ।
स्वाहा कर देते स्वयं को,
त्यागमय उनके हैं गानें ।।

उतर आया है गगन
नीचे, मिटी धरती पिपासा ।
धन्य है सुषमा प्रकृति की ,
बंध रही जीवन की आशा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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