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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “बरसात”

बरसात

यह बारिश का मौसम, बहुत ही सुहाना ,
बुझी प्यास धरती की, खेतिहर मगन है ।
संयोगीजनों की तो बातें न पूछो ,
जगा प्रेम प्रति मन में अद्भुत लगन है ।।

क़लम कविगणों की है मुखरित सखे सच,
छुपे भाव मन के अचानक हैं निकले ।
विविध रूप में काव्य रचते हैं पल में,
घटा देख घन की, विविध भाव निकले ।।

छपाछप मचाती है बच्चों की टोली,
विविध रंगों के दीखते प्यारे छाते ।
छाई गांवों में लोकगीतों की ध्वनि है ,
मगर साथ में होतीं बाढ़ों की बातें ।।

फटे बादलों ने तबाही मचाई ,
दरकते पहाड़ों से बिगड़ा नज़ारा ।
कहीं गिरी बिजली,मरे जीव प्यारे,
कहीं तोड़ बंधा, प्रवाहित है धारा ।।

हैं सड़कों में गड्ढे या गड्ढों में सड़कें,
पता ही नहीं, श्वेतमय मार्ग सारा ।
कहीं हास्य है तो कहीं पर रुदन है,
तदपि गान वर्षा का,सबको है प्यारा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 


 

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