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शिक्षक दिवस पर “मार्कण्डेय त्रिपाठी” की पंक्ति

शिक्षक दिवस

पांच सितंबर शिक्षक दिवस है ,
जो सबके मन भाता है ।
विद्यार्थी और शिक्षक का ,
बड़ा पूण्यमय नाता है ।।

डॉ, राधाकृष्णन् जी का ,
जन्म दिवस इस दिन भाई ।
शिक्षक से राष्ट्रपति बनें जो ,
सफ़र रहा अति सुखदाई ।।

सफल दार्शनिक थे वे सचमुच ,
जीवन दर्शन में निष्णात ।
प्राच्य और पाश्चात्य दोनों के ,
चिंतन में वे थे प्रख्यात ।।

उनकी यादें ताजा होतीं ,
सादा जीवन, उच्च विचार ।
भाषण, लेखन में पारंगत ,
उनका मधुमय था आचार ।।

शिक्षक की है बहुत महत्ता ,
उस पर राष्ट्र चरित का भार ।
सीमित नहीं किताबों तक वह ,
वह सचमुच ईश्वर अवतार ।।

उसकी बातें दिशा दिखातीं ,
जब भी भ्रम की हो स्थिति ।
शिक्षक द्वार खुला रहता है ,
जिससे मिट जाती सब भीति ।।

शिक्षक और गुरु में अंतर है ,
गुरु से जगता है अध्यात्म ।
गुरु जीवन की कला सिखाता ,
और कराता दर्शन आत्म ।।

गुरु ईश्वर तक पहुंचा देता ,
गुरु ही देता है सद्ज्ञान ।
सारे तमस् दूर करता वह ,
उसमें भरा हुआ विज्ञान ।।

योग्य शिक्षक , जिज्ञासु छात्र ,
सच बड़े भाग्य से मिल पाते ।
मिलन धन्य है उन दोनों का ,
अद्भुत दोनों की बातें ।।

शिक्षक नौकर नहीं किसी का ,
वह तो राष्ट्र निर्माता है ।
पूज्य भाव उसके प्रति रखना ,
मन को बड़ा सुहाता है ।।

गुरु का एक अर्थ भारी है ,
शिष्य पर उसकी पड़ती छाप ।
शिष्य देख गुरु याद आ जाते ,
इस दर्शन को समझें आप ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

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