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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “माँ की रोटी”

माँ की रोटी

ममतापूर्ण है मां की रोटी, देती है वह अनुपम स्वाद ।
पेट भले ही भर जाता हो,पर मन नहीं भरे, यह याद ।।

एक रोटी जब कभी मांगता, वह देती थी दो रोटी ।
एक शत्रु को दी जाती है,खा लो, यह रोटी छोटी ।।

कितना प्यार भरा था उसमें,बिन पूछे रोटी रखती ।
याद करोगे मुझे कभी तुम, मेरी मां हंसकर कहती ।।

उसे पता था खाकर कितनी रोटी भरता पेट मेरा ।
कम खाने पर वह उदास हो कहती, किसने मति फेरा ।।

यही उम्र खाने,पीने की, नहीं अभी है घर का भार ।
स्वस्थ रहोगे तभी संभालोगे,अपना मधुमय संसार ।।

बंद करो बाहर का भोजन, नहीं स्वास्थ्यप्रद वह खाना ।
उससे भली है घर की खिचड़ी,मत करना अब मनमाना ।।

विविध हाथ से बनी रोटियां,खाई हैं मैंने यारों ।
पर वह स्वाद नहीं मिलता है, इस अनुभव को उर धारो ।।

मुंह से निकल गया अनुभव तो सुनने पड़ते हैं तानें ।
चलो बुला लो फिर अम्मां को, बहुत बनो मत अनजाने ।।

सब कुछ समझ रही हूं मैं भी,ऊब गए खाते खाते ।
असर बुढ़ापे की है तुम पर, भूल रहे रिश्ते नाते ।।

थाली में जो आए,खा लो , बहुत बोले तो खैर नहीं ।
बहू, बेटियों वाले हो तुम,लेना नाहक बैर नहीं ।।

उन्हीं रोटियों में अब ढूढ़ूं , मैं मां की वह प्रिय रोटी ।
अश्रु नयन में छा जाते हैं, सुनता जब बातें खोटी ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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