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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “कृष्ण वियोग”

कृष्ण वियोग

नहीं लौटकर ब्रज कभी आए मोहन,
तड़पती रहीं गोपियां सच बेचारी ।
कठिन है बहुत,पीर उनकी बताना,
प्रभू जानते, कैसे जीवन गुजारीं ।।

उड़ी सबके चेहरे से मुस्कान थी तब,
प्रवाहित रही पूण्य आंसू की धारा ।
प्रकृति की छटा मन की पीड़ा बढ़ाती,
भला कौन था, जो दे उनको सहारा ।।

बिलखती रहीं प्रेम की राह पर वे,
बहुत थी कठिन,सच में उनकी परीक्षा ।
मगर आस तब भी रही गोपियों में,
नकारा उन्होंने उद्धव ज्ञान शिक्षा ।।

सदा मौन साधे, वे पथ को निहारें,
हुई सूखकर कांटों सम थी वो राधा ।
पूछो हाल मत पूज्य माता, पिता की,
कठिन है बताना, हुए दोनों आधा ।।

उधर कृष्ण भी याद कर उन क्षणों को,
बिलखते रहे , किंतु मजबूरियां थीं ।
उन्हें पूरा करना था उद्देश्य अपना,
मगर मन से उनमें नहीं दूरियां थीं ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

 

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