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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “हिन्दुत्व”

हिन्दुत्व

उर में समाया जो सदा ,
जिससे मेरा अस्तित्व है ।
जिस पर समर्पित भाव सब,
वह बस मेरा हिन्दुत्व है ।।

सद् ग्रन्थ पोषित सोच से ,
जिसका अमित विस्तार है ।
जिसमें समाहित विश्व यह ,
जो स्नेह की रसधार है ।
जिससे सुसंस्कृत छवि धरा की,
जग में रम्य प्रभुत्व है ।।

जो अस्मिता है राष्ट्र की ,
संस्कृति की शुचि पहचान है ।
जिसने दिए साधक अनेकों ,
जो हमारी जान है ।
गुण गान करते संत जन ,
जिसमें निहित अमरत्व है ।।

जो विविध बाधा तोड़कर ,
सन्मार्ग पर बढ़ता रहा ।
निज शौर्य की पूंजी लिए ,
शुचि सीढ़ियां चढ़ता रहा ।
जो ईश का वरदान है ,
नित सद्गुणों का तत्व है ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

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