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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “उपनयन संस्कार”

उपनयन संस्कार

उपनयन का आर्य संस्कारों में,
गरिमामय जगह है ।
यह दशम् संस्कार है ,
जिसकी महत्ता की वजह है ।।

इसे जन व्रतबंध कहते ,
जो सजग पथ की निशानी ।
मुण्डन ,जल स्नान से ,
बढ़ती है जीवन की कहानी ।।

महिमा यज्ञोपवीत की ,
सद् ग्रंथ नित हमको बताते ।
ऋषि, मनीषी भी सदा ,
इसकी महत्ता कह अघाते ।।

बाएं कंधे के ऊपर ,
दाईं भुजा के रहे नीचे ।
इस तरह पहनें जनेऊ ,
जो हृदय को सतत् सींचे ।।

शुरू होती शिक्षा दीक्षा ,
बढ़ें पथ पर ब्रह्मचारी ।
उच्चरित कर वेद मंत्रों को,
रहें नित सदाचारी ।।

पर न जानें आज कल ,
क्या हो गया,भटकाव आया ।
आधुनिक बनने का चक्कर ,
अब जनेऊ से अघाया ।।

घर नहीं कोई बचा अब ,
जहां न अपमानित जनेऊ ।
पहनना तक बंद है ,
कुतर्क अगणित आज देऊ ।।

बस निमंत्रण के समय ,
कुछ जन पहनते, यह दशा है ।
खूंटी पर लटका जनेऊ ,
देखकर मन अब धंसा है ।।

बस दिखाने के लिए ,
कुछ लोग धारण आज करते ।
मत पूछो संस्कार क्या है,
लोग कहने से भी डरते ।।

क्या थे, क्या हैं, और क्या होंगे,
कुछ नहीं हमको पता है ।
सत्य कड़वा है मगर ,
कहने में ना किंचित् खता है ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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