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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “हिन्दू संस्कृति”

हिन्दू संस्कृति

हिन्दू संस्कृति विश्व को ,
अपना समझकर जोड़ती है ।
भटके मानव को सदा ,
निज दिव्य पथ पर मोड़ती है ।।

बदलते परिवेश में ,
हर समीकरण हैं आज़ बदले ।
संघ पहुंचा मस्जिदों में ,
निज परिष्कृत सोच कद ले ।।

राष्ट्र ऋषि की श्रेष्ठ संज्ञा ,
भागवत जी को मिली है ।
दूरियां कम हो गईं ,
उर की कली शोभित खिली है ।।

राष्ट्रवादी सोच ने ,
नवचेतना को है जगाया ।
एक है संस्कृति हमारी ,
है नहीं कोई पराया ।।

जन्म से हिन्दू हैं सब ,
प्रभु अर्चना चाहे पृथक् हो ।
राष्ट्र मंदिर के पुजारी
सब, भले कोई घटक हो ।।

राष्ट्र की उन्नति में ही सच,
निहित है सबकी भलाई ।
सोच कलुषित ने ही सच ,
इस राष्ट्र गरिमा को गिराई ।।

आज का भारत सहर्षित ,
प्रगति पथ पर बढ़ रहा है ।
कुशल है नेतृत्व इसका ,
सीढ़ियों पर चढ़ रहा है ।।

विश्व की आर्थिक दशा ,
जब लुढ़ककर अब चिख रही है ।
तब प्रखर गति नित हमारी,
नव इबारत लिख रही है ।।

आपसी झगड़ों को तजकर ,
एक हैं हम, सभी सोचें ।
राष्ट्रहित सर्वस्व स्वाहा ,
मंत्र रख,दुर्भाव नोचें ।।

सबसे पहले भारतीय हैं ,
बाद में कुछ और हैं हम ।
बस यही पहचान सबकी ,
फिर नहीं होगा कोई ग़म ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

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