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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “हिंदी दिवस”

“हिन्दी दिवस”

पितृ पक्ष की तरह आज हम ,
मना रहे हिन्दी पखवारा ।
जो है मात्र दिखावा,मन में
अंग्रेजी ने डेरा डारा ।।

रोटी, हिन्दी की खाते पर ,
अंग्रेजी में करते बातें ।
आज चतुर्दिक हाल यही है,
दशा देख, लगतीं आघातें ।।

सरकारी अनुदान बहुत है ,
फिर भी असर नहीं कुछ दिखता ।
बहुतों की चल रही नौकरी ,
आहत कवि बेचैन हो लिखता ।।

राजभाषा निश्चित है हिन्दी ,
दर्ज़ा नहीं राष्ट्रभाषा का ।
राजनीति के चक्रव्यूह में ,
दमन हो रहा है आशा का ।।

जनभाषा के रूप में हिन्दी ,
रखती है अपनी छवि प्यारी ।
नहीं किसी की मोहताज यह,
इसकी महिमा सच है न्यारी ।।

हिन्दी भक्त कहाते हैं जो ,
कान्वेंट में भेजें बच्चे ।
कहते, यह तो समय मांग है,
पर ,हम तो हैं दिल के सच्चे ।।

कवि सम्मेलन और भाषण से,
गूंज रहा हिन्दी पखवारा ।
बस, थोड़े दिन की रौनक है ,
उसके बाद वही है कारा ।।

स्पीक हिन्दी, रिस्पेक्ट हिन्दी ,
लिखकर हिन्दी प्रेम जताते ।
ऐसा हिन्दी दिवस आज है ,
इससे अधिक कहें क्या भ्राते ।।

यह दोहरा चरित्र हिन्दी प्रति ,
सचमुच में है अति दुखदाई ।
पता नहीं कब हम सुधरेंगे ,
समझेंगे हिन्दी प्रभुताई ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

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