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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “दशा और दिशा”

दशा और दिशा

भैया, मुझको साथ ले चलो,
नहीं गांव में है कुछ काम ।
कुछ भी करके पेट भरूंगा,
बहुत हो चुका अब आराम ।।

यही उम्र है कुछ करने की,
डिग्री सारी लगे बेकार ।
पढ़ लिखकर घर में बैठा हूं,
जीवन सच लगता है भार ।।

सरकारी नौकरी न मिलती,
अब तक बहुत भरे हैं फार्म ।
निकल जा रही उम्र की सीमा,
वक्त बजाता है अलार्म ।।

चपरासी जो बने आज हैं,
वे भी चलते सीना तान ।
व्यंग्य बाण सहता हूं निशि दिन,
मिटा पढ़ाई का अब शान ।।

सरकारी तिकड़म के आगे,
आज व्यथित हैं शिक्षा मित्र ।
बड़ा कठिन घर बार चलाना,
दुखदाई है सारा चित्र ।।

शोषण बहुत हुआ है अब तक,
निजी शिक्षक हैं लाचार ।
स्कूलों की बाढ़ आ गई,
शिक्षा बनी आज़ व्यापार ।।

मां वाणी कुंठित हैं देखो,
लक्ष्मी का चहुं ओर प्रभाव ।
जिसके पास रमा हैं प्यारे,
परिवर्तित है उसका भाव ।।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे,
सही कहावत, पड़ती जान ।
पर मुझ पर क्या गुजर रही है,
मिटी आज खुद की पहचान ।।

शहरों में क्या, कौन कर रहा,
नहीं पूछते हैं जन आज़ ।
पर गांवों की सोच अलग है,
पृथक् यहां का सभ्य समाज ।।

दुख होगा, मुझको मालूम है,
पर मैं सब कुछ सह लूंगा ।
बहुत बोझ मेरे ऊपर है,
तुमसे सब कुछ कह दूंगा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी !

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