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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “मिलावट”

“मिलावट”

नहीं शुद्धता आज दिखती कहीं भी ,
मिलावट ने सारे भरम को मिटाया ।
बाजारों में कुछ भी, कहीं भी खरीदें ,
मिले हर जगह ,बस मिलावट की माया ।।

दिखे शुद्धता मात्र विज्ञापनों में ,
मगर वस्तुओं में नहीं आज मिलती ।
समझ में न आता कि क्या खाएं हम सब ,
नहीं आत्मा आज़ भोजन से खिलती ।।

शहद,दूध,घी और अनाजों को छोड़ो ,
फलों, सब्जियों में भी होती मिलावट ।
मिठाई कहां शुद्ध मिलती है अब तो ,
निरर्थक लगे आज इसकी सजावट ।।

दवा,पेय और खाद्य,सब आज शंकित ,
कहां तक लगाए कोई आज़ अंकुश ।
गरल बेचते जन सुधा नाम लेकर ,
मरी आत्मा, फिर भी लगते वे ही खुश ।।

हवा, पानी,सब कुछ प्रदूषित है देखो ,
भला कौन है इसका ज़िम्मेदार,सोचो ।
अगर स्वास्थ्य ही आज़ संकट में,तब तो,
निरर्थक है सब कुछ, प्रकृति को न कोचो ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

 

मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “मिलावट”

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