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रोटी की महत्ता – कवि : मार्कण्डेय त्रिपाठी

रोटी की महत्ता

हर भूखे को रोटी देना ,
सभी जानते पूण्य कार्य है ।
पर रोटी मिलती है कैसे ,
यह शिक्षा भी अनिवार्य है ।।

अपनी मेहनत के बलबूते ,
जो रोटी मिलती, फलदाई ।
उस रोटी का स्वाद अलग है ,
स्वाभिमान जगता है भाई ।।

भीख में मिली हुई रोटी सच,
अंतर्मन को सदा रुलाती ।
पेट भले भरता हो उससे ,
किंतु नहीं वह सुकुन दिलाती ।।

रोटी का महत्व कितना है ,
लोगों को समझाना होगा ।
मेहनत से रोटी मिलने का,
सबको पाठ सिखाना होगा ।।

मुफ्त में सब कुछ पा लेने की,
ललक सदा होती दुखदाई ।
लोगों को आलसी बनाती ,
कुंठित होती है तरुणाई ।।

घर बैठे भोजन मिलता हो,
तब क्यों, कोई काम करेगा ।
हाथ,पांव बांधे यौवन भी ,
बस घर में आराम करेगा ।।

काम नहीं यदि मिले किसी को,
तो बस खुराफात सुझती है ।
खाली मन शैतान का घर है ,
पेट की आग कहां बुझती है ।।

युवा शक्ति परेशान आज है,
कुछ भी नहीं समझ में आता ।
कैसे आज कमाए रोटी ,
मार्ग कोई ना उसे सुझाता ।।

नेताओं की बात न पूछो ,
उन्हें चतुर्दिक हरियाली है ।
भीड़ जुटाती रहती हरदम ,
बजवाती रहती ताली है ।।

महंगाई के महादौर में ,
बड़ा कठिन घर बार चलाना ।
जिस पर गुज़र रही वह जाने,
रोटी का कुछ नहीं ठिकाना ।।

कवि – मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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