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मार्कण्डेय त्रिपाठी की पंक्ति “आदर्श जीवन”

आदर्श जीवन

बाहर से वे शांत दीखते ,
पर अंदर लड़ते रहते हैं ।
तूफ़ानों में भी मुस्काते ,
शुचि पथ पर बढ़ते रहते हैं ।।

भाई, भगवान, भागीदार प्रति,
उनकी सोच प्रेममय होती ।
कभी नहीं धोखा देते वे ,
वे जगते,जब दुनियां सोती ।।

सबकी हाल चाल नित पूछें,
पर निज पीड़ा नहीं बताते ।
कहते,सुख दुख,आते जाते ,
सदा लोकहित कर्म निभाते ।।

मौन, व्यथा सब कुछ कह देती,
फिर भी मुख मंडल मुस्काता ।
परहितकारी जीवन उनका ,
सदा स्नेहमय सबसे नाता ।।

पत्थर सा कठोर उर होता ,
कभी पुष्प सा कोमल भ्राता ।
मन की बात कोई ना जानें ,
उनमें सबका हृदय समाता ।।

वे अजातशत्रु कहलाते ,
उनका घर,सबका घर होता ।
भेदभाव से ऊपर उठकर ,
उनमें सभी लगाते गोता ।।

पुरस्कार,पद सभी तुच्छ हैं,
इनकी मन में चाह न होती ।
मार्ग प्रशस्त किया करते वे ,
झरती है वाणी से मोती ।।

चिंतन का विस्तार बहुत है,
विद्या व्यसनी शुचि स्वभाव है ।
प्राणप्रिय होती हैं पुस्तकें ,
सभी पढ़ें, यह पुण्य भाव है ।।

वीणा के तारों सम उर है ,
छेड़ो , सुनकर खूब अघाओ ।
अद्भुत ज्ञान भरा है उनमें ,
शुचि सरिता में डूबो,नहाओ ।।

क्षण भर की भी मुलाकात में,
वे निज छाप छोड़ देते हैं ।
उनकी कीर्ति अमर हो जाती,
पर दुख वे निज सिर लेते हैं ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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