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देवी छिन्नमस्ता

देवी छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में से एक है।

दस महा विद्या : 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।

मार्कण्डेय पुराण और शिव पुराण में माता की कथा मिलती है। उन्होंने ही चंडी रूप धारण करके असुरों का संहार किया था। माता छिन्नमस्ता का रूप विकराल है। देवी का मस्तक कटा हुआ है और इनके कबंध से रक्त की तीन धाराएं बह रही हैं। इनकी तीन आंखें हैं और ये मदन और रति पर आसीन है। देवी के गले में हड्डियों की माला तथा कंधे पर यज्ञोपवीत है।इनका रूप भयावह है,इसलिए शांत भाव से इनकी उपासना करने पर यह अपने शांत स्वरूप को प्रकट करती हैं। उग्र रूप में उपासना करने पर यह उग्र रूप में दर्शन देती हैं जिससे साधक के उच्चाटन होने का भय रहता है।

माता का स्वरूप अतयंत गोपनीय है। माता ने यह रूप क्यों धरा इसके पीछे एक कथा है। माता को चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। जिन्हें अजया और विजया भी कहा जाता है। युद्ध में दैत्यों को परास्त करने के बाद माता अपनी सखियों के साथ स्नान करने गयी। स्नान के समय इनके सखियों ने निवेदन किया कि उन्हें भूख लगी है। माता ने उन्हें थोड़ा रुकने को कहा। क्षुधा से व्याकुल सखियों ने फिर माता से आग्रह किया, माता ने उन्हें फिर रुकने का आदेश दिया। माता की सहेलियां भूख से व्याकुल होकर माता से कहने लगी कि आप हमारी माँ हो और माँ कभी अपने बच्चों को भूखा नहीं रखती। उनके वचन सुन माता मुस्कुराई और अपनी कटार से अपना गर्दन धड़ से अलग कर दिया। एक हाथ में कटार और दूसरे हाथ में अपना मस्तक रखी माता के गर्दन से रक्त की तीन धारा निकली। तीनों ने रक्तपान किया और अपनी क्षुधा मिटाई। माता ने अपनी सखियों के रुधिर पिपासा शांत करने के लिए अपना मस्तक काटकर रुधिर पिलाया था। इसीलिए माता को छिन्नमस्ता नाम से पुकारा जाता है।

चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना करने से साधक को सरस्वती की सिद्ध प्राप्त हो जाती है। पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है। इससे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन बुद्धि ज्ञान बढ़ जाता है। शरीर रोग मुक्त होताते हैं। सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शत्रु परास्त होते हैं। यदि साधक योग, ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक पारंगत होकर विख्यात हो जाता है।

कामाख्या के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात मां छिन्नमस्ता का मंदिर काफी लोकप्रिय है। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छिन्नमस्ता देवी का मंदिर है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है। यह मंदिर लगभग 6000 साल पुराना बताया जाता है।

माता छिन्नमस्ता की आराधना के लिए रूद्राक्ष माला से दस माला प्रतिदिन ‘श्रीं ह्नीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियमानुसार जाप की क्रिया करें।

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