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झोपड़पट्टी के बच्चों की प्रतिभा को सही अवसर से मिलने वाली सफलता का सार्थक चित्रण है ‘झुंड’

फिल्म समीक्षा – साढ़े तीन स्टार

कई फिल्मकारों ने गरीब वंचित और गरीबी से संघर्ष करते लोगों की कहानियों को पर्दे पर दिखाने को कोशिश की है। गरीबी या झोपड़पट्टी के लोगों का संघर्ष और इनके अंदर छुपी प्रतिभा का दर्शन रुपहले पर्दे पर बार बार होता रहता है। इस विषय पर सुपरहिट फिल्म ‘स्लम डॉग मिलिनियर’ बन चुकी है। रानी मुखर्जी की ‘हिचकी’ में भी झोपड़पट्टी के बच्चों की छुपी प्रतिभा को दिखाया था। साथ ही रणवीर सिंह, आलिया भट्ट की ‘गली बॉय’ भी झोपड़पट्टी की प्रतिभा पर केंद्रित थी। ऐसे ही अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म ‘झुंड’ में झोपड़पट्टी के बच्चों के अंदर छुपी प्रतिभा की कहानी है। यह फिल्म नागपुर के स्लम सॉसर एनजीओ के फाउंडर विजय बारसे के जीवन से प्रेरित है। जिन्होंने झोपड़ी में रहने वाले वंचित बच्चों के उत्थान के लिए कार्य किया है और उनकी विक्षिप्त मानसिकता को बदलकर फुटबॉल खिलाड़ी बनाया।
निर्देशक नागराज मंजुले ने इस फ़िल्म में झोपड़पट्टी के बच्चों की खेल प्रतिभा को दर्शाया है।
फिल्म की कहानी में कई छोटे छोटे कहानी भी शामिल है पर देखा जाए तो ये विजय बोराडे (अमिताभ बच्चन) की फ़िल्म है। विजय नागपुर के कॉलेज में स्पोर्ट्स टीचर है और वे जल्द ही रिटायर होने वाले हैं। विजय घर पर प्रौढ़ शिक्षा केंद्र भी चलाते हैं। वह जहाँ रहते हैं वहीं पास में झोपड़पट्टी है। विजय हमेशा वहाँ से गुजरते हुए उन बच्चों को देखता है। ये सभी बच्चे जुआ, नशा, चोरी और मारपीट जैसे अपराध करते रहते हैं। इनके जीवन का कोई लक्ष्य ही नहीं है। एक दिन विजय वहाँ से गुजरते हुए उन बच्चों को फुटबॉल खेलते देखता है और उनका खेल का तरीका देख उन्हें खुशी महसूस होती है। वह पैसों का लालच देकर बच्चों को रोज फुटबॉल खेलने के लिए प्रेरित करते हैं। धीरे धीरे बच्चों के अंदर भी फुटबॉल के प्रति रुचि जागती है। विजय अपने कॉलेज और झोपड़पट्टी के बच्चों के बीच फुटबॉल का खेल करवाना चाहते हैं और वे कामयाब भी होते हैं। इसी से प्रेरित होकर विजय झोपड़पट्टी के लोगों के बीच राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिता रखते हैं जिसमें अनेक राज्यों के कई बच्चे भाग लेते हैं। इन्हीं लोगों में विजय को बेहतरीन खिलाड़ी मिलते हैं। तभी विजय की टीम को अंतरराष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का मौका मिलता है। किंतु झोपड़पट्टी के बच्चों का फुटबॉल का खेल खेलना इतना आसान नहीं था। आखिर कैसे विजय इन खिलाड़ियों को विदेश ले जा पायेगा क्या ये रास्ता आसान है जितना दिखता है ? कोई अपराधी, कोई अनपढ़, कोई पारिवारिक रूढ़ियों से बंधा हुआ, क्या ऐसे लोगों को बाहर जाने का वीजा या पासपोर्ट मिल पायेगा ? इन बातों का उत्तर फिल्म देखने पर मिल पायेगा।
क्लाइमैक्स में एयरपोर्ट में तलाशी के दौरान अपराधी प्रवृत्ति वाले अंकुश के चाकू फेंकने के बाद उसके आगे के सुनहरे भविष्य की ओर इशारा करने वाला दृश्य फिल्म का सकारात्मक पक्ष है। यह सीन भावनात्मक बन पड़ा है।
फ़िल्म के फिल्मांकन की बात करें तो निर्देशक ने झोपड़पट्टी के माहौल को फ़िल्म में बारीकी से दिखाया है। जो वास्तविक ही प्रतीत होते हैं।
अभिनय के मामले में महानायक अमिताभ बच्चन तो बड़े पर्दे के जादूगर हैं। पूरी फिल्म उन्हीं पर केंद्रित है और दर्शक भी वही जुटा पाएंगे। महानायक के साथ स्क्रीन शेयर करना क्षेत्रीय कलाकारों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन यहां पर बिग बी के साथ सभी कलाकार बढ़िया तालमेल बिठाने में सफल हुए हैं। गली के डॉन की भूमिका में अंकुश गेडाम ठीक ठाक लगे हैं। कहीं कहीं नर्वस लगे हैं। बाबू के किरदार में प्रियांशु क्षत्रिय प्रभावी है। ‘सैराट’ फेम रिंकू राजगुरु और आकाश तोसर भी फिल्म का हिस्सा है। आकाश फिल्म में नकारात्मक भूमिका में हैं तो वहीं रिंकू ग्रामीण अंचल की एक फुटबॉल खिलाड़ी है जो अनपढ़ और बेहद गरीब है जिसे दुनियादारी भी नहीं मालूम। सभी कलाकारों ने अपने अभिनय का पूरा जादू बिखेरने की कोशिश की है। बाकी कलाकारों का काम अच्छा है और सभी नैचुरल लगे हैं। लोकल कलाकारों से नागपुर की बोली सुनने में मज़ेदार लगती है।
फिल्म में इंटरवल से पहले का हिस्सा आपको मायूस करेगा लेकिन दूसरा भाग रोचकता और गंभीरता लाता है। फ़िल्म में फुटबॉल प्रतिस्पर्धा को सही ढंग से प्रस्तुत करने में निर्देशक ज्यादा सफल नहीं रहे हैं। कई किरदारों की जीवनी में कमी सी लगी। भावनाएं दर्शकों के दिल तक पहुंचने में काफी वक्त लगाती है। अजय अतुल का गीत संगीत कुछ संतुष्टि देता है। फ़िल्म के कई संवाद वास्तविकता को दर्शाती है जैसे मुस्लिम पुरुष का तीन तलाक देना लेकिन औरत अपनी मर्जी से तलाक नहीं दे सकती। झोपड़पट्टी के बच्चों को भारत क्या है मालूम नहीं। सरकारी दफ्तरों में जीवित या मृत हो लेकिन हर काम के लिए कागज जरूरी है। इतनी आबादी वाले हमारे देश में ओलंपिक पदक कम क्यों मिलते हैं। ऐसे बहुत सारे दृश्य है जो सोचने को मजबूर कर देती है।
‘झुंड’ के लेखक, संवाद लेखक और निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले हैं।
फिल्म का निर्माण भूषण कुमार, किशन कुमार, सविता राज हीरेमठ, राज हीरेमठ, मीनू अरोरा, संदीप सिंह, नागराज पोपटराव मंजुले और गार्गी कुलकर्णी ने मिलकर किया है।
इसके डीओपी सुधाकर यक्कन्ति रेड्डी तथा एडिटर कुतुब इनामदार और वैभव दाभाड़े हैं।

– संतोष साहू

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