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संकेतों पर निर्भर हुए संबंध – जी एस पांडेय (कवि)

संकेतों पर निर्भर हुए संबंध।
लग रहा है ऐसा है कोई अनुबंध।।
संकेतों में बात हो रही जिसका नहीं कोई अर्थ।
वह दिन अब दूर नहीं जब संबंध होंगे व्यर्थ।।
प्रगति के सोपान से शिखर को हमने छू लिया।
धरा पर जब देखा यूं लगा प्रगति ने सब कुछ लील लिया।।
कार्य नहीं है पर व्यस्त हैं ऐसी हो गई रीत।
ऐसा यंत्र मिला है सबको
दूर कर दिया मन का मीत।।
पूरा परिवार बैठा हुआ है एक साथ।
नहीं होती है किसी से कोई बात।।।
मुंह पर ताले लग गए
अंगुलियां कर रही काम।
बिना संवाद के क्या होगा अंजाम।।

जी एस पांडेय (कवि)

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