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वक़्त गुजरने पर लौट के नहीं आता है,

लगाया था आम वो कीकर बन गया,
लोगों ने कहा ऐसा गजब कैसे हो गया।

मैंने उनसे कहा मुझसे भूल हो गई,
दुनियां की चकाचौंध में मैं खो गई।

मैंने ही उसमें स्नेह का खाद नहीं डाला,
हाफुज समझ ढिंढोरा पिट डाला।

तुलना के सागर में डुबकी लगाती रही,
व्यक्तित्व की खासियत ना समझ सकी।

आधुनिकता का जल मैं सींचती रही,
आडंबर के चकाचौंध में मैं खो गयी।

दिखावे की होड़ में अज्ञान बन गयी,
अपनी ही नींव का नुकसान कर गयी।

काश मैंने संस्कार और संस्कृति बताई होती,
इंसानियत की सीख सीखाई होती।

मेरा आम कीकर में ना बदलता,
सबके जीवन में आतंक ना भरता।

हर पालक को सिख ये समझानी चाहिए,
निज संतान में मानवता भरनी चाहिए।

वरना स्वार्थ में परमार्थ भूल जाएंगे,
गैरों के साथ अपनों को भी तड़पाएंगे।

कच्ची मिट्टी को आकार दिया जा सकता है,
पकने पर हल्की चोट से भी टूट जाता है।

वक़्त गुजरने पर लौट के नहीं आता है,
समझदार के लिए इशारा बहुत होता है।

आम को खास बनाया जा सकता है,
स्वाभिमान का अलख जगाया जा सकता है।

(कीकर=बबुल का पेड़
हाफुज=आम की उन्नत किस्म)

गायत्री साहू

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