ब्रेकिंग न्यूज़
विश्व

विशालकाय मादा एंग्लर फिश की रहस्यमयी कहानी

 

तीन फीट की मादा और सात मिलीमीटर का नर, कैसे साथ जीते हैं ज़िंदगी!

समुद्री सतह से तीन किलोमीटर गहरे घुप्प अंधेरे, जमा देने वाले ठंडे पानी और पानी के उच्च दबाव जैसे असहनीय आवास में बहुत कम समुद्री जंतु जीवित रह पाते हैं। लेकिन इन्हीं जंतुओं में शामिल है एंग्लर फिश। चौड़ा मुंह, उसमें बड़े-बड़े दांत और सिर के ऊपर से मुंह के आगे तक लटकता व चमकता एंटेना मादा एंग्लर फिश की एक अलग ही तस्वीर पेश करता है।

एंग्लर फिश को एक विचित्र मादा मछली के रूप में साल 1833 में किनारों से खोजा गया था। तब से अब तक वैज्ञानिकों को जो भी जानकारी प्राप्त हुई है, उसमें से अधिकांश जाल में पकड़ी गई मृत मादा के नमूनों से ही हुई है क्योंकि जीवित मछली को गहरे समुद्र के अनुकूलित वातावरण से जब भी ऊपर लाया जाता है तो दबाव और तापमान के असहनीय अंतर से वह मर जाती है। पिछले दो दशकों में बेहतर पनडुब्बी तकनीक और गहरे समुद्र में खोज-पड़ताल के अभियानों द्वारा फिल्म बनाने से इनके अद्भुत रहस्यमय संसार और व्यवहार से पर्दा जरूर हटा है।

एंग्लर मछली को लेकर एक विचित्र तथ्य यह है कि कुछ एंग्लर मादाएं तीन फीट तक लम्बी होती हैं, जबकि उनके नर केवल 6 या 7 मिलीमीटर के ही होते हैं। ऐसे में कमजोर एवं छोटे नरों के लिए विशाल समुद्री गहराई में अपनी मादा को खोजना चुनौतीपूर्ण कार्य होता है। इस वजह से अनेक नर तो जोड़ा बनाने से ही वंचित रह जाते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए मादा में सूंघने के दो बड़े अंग पाए जाते हैं। जैसे ही नर मादा के पास पहुंचते हैं, मादा अपने शरीर में प्रतिदिप्ति (बायोल्युमिनिमेन्ट) प्रकाश पैदा करने लगती है। प्रकाश के पैटर्न को पहचान कर नर मादा की ओर खींचा चला जाता है।

एंग्लर फिश की ही कुछ प्रजातियों के नर कुछ समय मादा के साथ जुड़े रहने के बाद अपने रास्ते निकल जाते हैं। कुछ अन्य में नरों ने सेक्सुअल पेरासिटिज्म (यौन परजीविता) विकसित कर ली है। ऐसे नर अपने मुंह से मादा के पेट पर पकड़ बनाकर जुड़ जाते हैं। अब नरों को न तो आंखों की जरूरत होती है और न ही पंखों की बल्कि भोजन देने का कार्य भी अब मादा के जिम्मे आ जाता है, क्योंकि नर अब परजीवी जीवन व्यतीत करने लगते हैं। जुड़ने वाला हिस्सा गलकर मादा के रक्त से भोजन प्राप्त करने लगता है। नर के अंग धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं। केवल वृषण (जनन ग्रंथी जहां नर के शुक्राणु रहते हैं) तथा गलफड़ों के अलावा नर का संपूर्ण भाग मादा के शरीर में सोख लिया जाता है। मादा के शरीर में धंसे नर बस शुक्राणुओं से भरी थैली भर रह जाते हैं। कुछ मादाओं में ऐसे आठ नर चिपके हुए देखे गए हैं। सेक्सुअल पेरासिटिज्म द्वारा प्रजनन को सुनिश्चित करना ही शायद गहरे और ठंडे समुद्रों में जरूरी था।

मादा के एक बार मिलने पर नर और मादा दोनों एक-दूसरे का साथ छोड़ने का खतरा नहीं उठा सकते। अंत में इस रिलेशन का फायदा मिलता है और जब मादा अंडे देने की तैयारी पूरी कर लेती है तो वह नर को रासायनिक संकेत देकर शुक्राणुओं का स्राव करवाती है। उसी समय मादा भी जैली में लिपटे अंडे देती है और इस तरह निषेचन होता है। जैली में लिपटे अंडे हल्के होने के कारण ऊपर उठकर समुद्र के प्रकाशमय हिस्से में आ जाते हैं। बाद अंडे से निकले अपरिपक्व शिशु वयस्क होने पर समुद्र के तल की ओर चले जाते हैं।

संबंधित पोस्ट

हत्या के आरोपी डेरेक चाउविन को मिली 22.5 साल की जेल

Hindustanprahari

इजरायल में मिले पुरातात्विक रहस्यमयी अवशेष

Hindustanprahari

आगामी बीस साल में नरकीय हो जाएगा मानव जीवन

Hindustanprahari

एसी में खुद ठंडे होकर पूरी दुनिया को गर्म कर रहे लोग

Hindustanprahari

क्यों मनाई जाती है अंबेडकर जयंती? जानें महत्व और इतिहास

Hindustanprahari