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मुंबई में प्रथम लोकसभा चुनाव 1951 

 

मुंबई में देश के प्रथम लोकसभा चुनाव में बाबासाहेब आंबेडकर को हार का सामना क्यों करना पड़ा था ? उन्हें किसने हराया था ? उस समय कौन-कौन से नेता चुनाव में खड़े थे ? किसे कितने वोट मिले थे? राजनीतिक व सामाजिक स्थिति कैसी थी ? बाबासाहेब के हारने के क्या कारण थे ? इन सब के बारे में विस्तार से पढ़िए इस पोस्ट में। – शरद कोकास

सन उन्नीस सौ इन्क्यावन का प्रथम लोकसभा का यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण था । जनता को इस चुनाव में यह साबित करके दिखाना था कि वह न केवल बाबासाहेब की विचारधारा और सिद्धांतों के सम्मान के अलावा संविधान के लिए किये गए उनके परिश्रम की न केवल सराहना करती है बल्कि उसका पालन करने का संकल्प भी लेती है साथ ही दलितों के लिए लड़ी गई लड़ाई में उनकी भूमिका को रेखांकित करती है ।

बाबासाहेब कांगेस में न होने के बावजूद अकेले नहीं थे, समाजवादी विचारधारा के प्रणेता अशोक मेहता जो सामान्य सीट से चुनाव लड़ रहे थे, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों के साथ उनके पक्ष में खड़े थे ৷ सामान्य जनता के बीच ऐसा मौखिक सन्देश दिया गया कि दो वोटों में से एक वोट सामान्य सीट के लिए अशोक मेहता को और एक वोट आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब आंबेडकर को दिया जाए ।

बॉम्बे राज्य की राजधानी मुंबई पूरे देश के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था । सिनेमा उद्योग, कपड़ा उद्योग, मछली व्यवसाय ऐसे अनेक क्षेत्रों में यहाँ के मजदूर कार्यरत थे । जहाँ एक ओर अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही थीं वहीं टीन और तिरपाल की छत के नीचे तंग झोपड़ियों में जाने कितने जीवन साँस ले रहे थे ।

“मुंबई ऐसी नगरी है जो सुबह इंसान को भूखा जगा तो सकती है लेकिन भूखा सोने नहीं देती ।“* यह मुहावरा पूरे देश में फ़ैल चुका था । मुंबई आने वाली रेलगाड़ियों में अपने सपनों की गठरी लादे प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में देश के कोने कोने से लोग चले आ रहे थे । यही थे वे वोटर जिन्हें आगामी चुनाव में बाबासाहेब का राजनीतिक भविष्य तय करना था ।

नियत तिथियों पर पूरे देश में यह चुनाव धूमधाम से संपन्न हुआ ৷ देश की जनता के लिए मताधिकार का यह पहला अवसर था ৷

पूरे देश में सत्रह करोड़ साठ लाख मतदाताओं में से दस करोड़ सत्तर लाख मतदाताओं ने अर्थात साठ प्रतिशत मतदाताओं ने इस चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग किया ৷

यह जनतंत्र का प्रथम उत्सव था जिसे हर पांच साल बाद दोहराया जाना था ।

राजनीति की बाज़ी शतरंज की तरह होती है वह कभी भी किसी ओर पलट सकती है । मुंबई में इस चुनाव की बहुत धूम मची लेकिन अंततः दिल्ली मुंबई पर हावी रही ।

सामान्य सीट से एक लाख उनंचास हज़ार एक सौ अड़तीस वोटों से कांग्रेस के विट्ठल गाँधी विजयी रहे ।

*Vitthal Gandhi-149138*

वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी अशोक मेहता को एक लाख उनतालीस हज़ार सात सौ इकतालीस वोट मिले ।

*Ashok Mehta-139741*

अशोक मेहता स्वयं तो हारे ही, आरक्षित सीट पर बाबासाहेब को वोट देने की उनकी मौखिक अपील भी जनता के बीच नहीं पहुँच पाई और तमाम कोशिशों के बावजूद बाबासाहेब यह चुनाव हार गए ৷ आरक्षित सीट से यह चुनाव कांग्रेस के नारायण सदोबा काजरोलकर ने जीता और इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया ৷

काजरोलकर को एक लाख अड़तीस हज़ार एक सौ सैंतीस वोट मिले ।

*Kajrolkar-138137*

वोटों के हिसाब से बाबासाहेब आंबेडकर चौथे स्थान पर रहे ৷

*Ambedkar-123576*

उन्हें काजरोलकर से चौदह हज़ार पांच सौ इकसठ वोट कम मिले इस तरह वह सीट के हिसाब से दूसरे स्थान पर और वोटों के हिसाब से चौथे स्थान पर रहे ।

*Vitthal Gandhi-149138*
*Ashok Mehta-139741*
*Kajrolkar-138137*
*Ambedkar-123576*

जैसा कि आजकल होता है उन दिनों भी चुनाव के उपरांत इस चुनाव में डॉ आंबेडकर के हारने व कांग्रेस के जीतने के कारणों का विश्लेषण किया गया । सोशलिस्ट पार्टी का सहयोग एक छद्म साबित हुआ था । नेहरु के रूप में कांग्रेस की देशव्यापी छवि उनके कद से भी बड़ी हो गई थी । गाँधी की चिता से उठती लपटों के अक्स अभी जनता की आँखों में दिखाई दे रहे थे और उसका इतनी जल्दी धूमिल होना असंभव था । इसके अलावा हार के कुछ स्थानीय कारण भी थे । विभाजन के पश्चात उत्तर मुंबई में ऐसे अनेक लोगों के आगमन हुआ था जिन्हें देश के पुनर्निर्माण में बाबासाहेब के योगदान के बारे में बिलकुल पता नहीं था । वर्तमान सरकार ने उनके पुनर्वास की व्यवस्था की थी । वे अपने देवता अपने मूल निवास के मंदिरों में छोड़ आये थे और अपने पालनहार के रूप में उन्होंने नई प्रतिमाएँ गढ़ ली थीं जो मनुष्यों के रूप में उनके देवता थे और भविष्य में अनेक वर्षों तक उसी स्थान पर बने रहने वाले थे ।

मुंबई की इस हार से बाबासाहेब आंबेडकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ৷ वे जानते थे संसद में उनके लिए कुर्सी भले न हो लेकिन देश के लोगों के दिलों में उनके लिए बहुत जगह थी और आनेवाली कई सदियों तक उस पद से उन्हें कोई नहीं हटा सकता था । मनुष्य के सुख, उसकी अस्मिता,अधिकार और गौरव के लिए लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में वे हमेशा के लिए विजेता घोषित कर दिए गए थे । नेहरू जी मतभेदों के बावजूद उन्हें खोना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से उनके सरकार में आने की व्यवस्था कर दी । लेकिन जनता के प्रतिनिधि के रूप में सरकार में आने का महत्त्व तब भी था और आज भी है और फिर बाबासाहेब तो देश की असंख्य जनता के चहेते थे इसलिए जैसे ही मध्य प्रांत के भंडारा ज़िले में यह प्रथम लोकसभा चुनाव रद्द घोषित किये जाने के बाद वह सीट खाली हुई बाबासाहेब ने भंडारा सीट से उपचुनाव लड़ कर लोक सभा में जाने का निर्णय कर लिया ৷

मुंबई का यह चुनाव अनेक मायनों में ऐतिहासिक रहा । इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि अंत तक कोई नहीं जान सकता कि राजनीति में ऊँट किस करवट बैठेगा । बाबासाहेब ने जिस जनता के लिए काम किया उसी जनता ने उन्हें हरा दिया इस घटना ने जनता व नेता के संबंधों का एक नया समीकरण स्थापित किया । लेकिन इसीके साथ यह भी तय हुआ कि जिस व्यक्ति की जगह लोगों के मन में होती है और जो जनता के लिए निस्वार्थ भावना से काम करता है देर से ही सही उसका उचित सम्मान होता है ।

बाबासाहेब को हराने वाले काजरोलकर को आज देश में बहुत कम लोग जानते होंगे लेकिन बाबासाहेब को पूरा विश्व जानता है । बाद में इस क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने की स्मृति में मुंबई उत्तर से दक्षिण तक पूरे मुंबई के मध्य से गुजरती हुई एक लम्बी सड़क बनाई गई जिसका नाम डॉक्टर आंबेडकर मार्ग रखा गया है ।

शरद कोकास

 

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