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 बच्चों में तेजी से फैलता ब्लड कैंसर

 

कम उम्र के बच्चे भी उसकी चपेट में तेजी से आ रहे है। जो कि जानलेवा बनता जा रहा है। शरीर में किसी भी अंग में कैंसर हो सकता है। जिसके कारण 100 से ज्यादा कैंसर की पहचान की जा चुकी है। जानिए इसके लक्षण और कैसे करें  डायग्नोसिस।

कैंसर के मरीज दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहे है। इसका मुख्य कारण खराब खानपान और खराब लाइफस्टाइल हो सकती है। लेकिन यह अनुवांशिक भी मानी जाती है। आपको यह बात जानकर हैरानी होगी कि कम उम्र के बच्चे भी उसकी चपेट में तेजी से आ रहे है। जो कि जानलेवा बनता जा रहा है। शरीर में किसी भी अंग में कैंसर हो सकता है। जिसके कारण 100 से ज्यादा कैंसर की पहचान की जा चुकी है। ज्यादातर केस ब्लड कैंसर के सामने आ रहे है। जो कि तेजी से ब्लड में फैलने वाला कैंसर है। इसके लक्षण को पहचानना थोड़ा सा मुश्किल है। लेकिन कुछ संकेतों को पहचान कर इसका समय में आप इलाज कर सकते है। जिससे कि यह जानलेवा साबित न हो।

बच्चों और किशोरों में आजकल कैंसर का मुख्य कारण क्या है?

बच्चों और किशोरों में आजकल कैंसर कई कारणों से बढ़ रहा है। आमतौर पर हमारे शरीर में होने वाले जेनेटिक म्यूटेशन के कारण आम कोशिकाएं बढ़ती हैं और खत्म हो जाती हैं। लेकिन जब यह कोशिकाएं बहुत ज्यादा बढ़कर अनियंत्रित हो जाएं तो यह कैंसर का रूप ले लेती हैं। बच्चों या किशोरों के जीन में होने वाले ये बदलाव कभी भी हो सकते हैं। इसका कारण आज भी साफ नहीं हो पाया है। वायरल संक्रमण के कारण भी जेनेटिक म्यूटेशन होता है। कई ऐसे वायरस होते हैं, जो कैंसर का कारण बनते हैं। रेडिएशन एक्स्पोज़र भी इसका एक कारण है। जिनमें एक्स-रे, सीटी स्कैन शामिल हैं। इसी के साथ केमिकल एक्स्पोज़र भी जेनेटिक म्यूटेशन का एक कारण है। हमारी जीवनशैली भी इसमें काफी अहम भूमिका निभाती है। बडे लोगों में सिगरेट, शराब व तंबाकू का सेवन कैंसर का मुख्य कारण है। वहीं मोटापा भी इसमें एक जोखिम कारक है, जो बडे और बच्चों दोनों के लिए कैंसर को बुलावा देता है, यदि कोई बच्चा बचपन में काफी मोटा रहा है, तो आगे चलकर उसे कैंसर होने की संभावना होती है।

 

बच्चों में आमतौर पर होने वाले कौन-कौन से कैंसर होते हैं ?

जैसे हमारे शरीर के हर अंग में कैंसर हो सकता है, इसी तरह बच्चों में भी कैंसर के कई प्रकार हैं। बच्चों में सबसे आम ब्लड कैंसर होता है, जिसे ल्यूकेमिया के नाम से भी जाना जाता है। इसमें कई प्रकार होते हैं, जिनमें एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया शामिल है। यह दो से दस साल तक के बच्चों में ज्यादा होता है। इसके इलाज की अवधि लंबी होती है, लेकिन लगभग 80 प्रतिशत बच्चे इस बीमारी से ठीक हो सकते हैं। इसके अलावा बच्चों में ब्रेन ट्यूमर हो सकता है। वहीं लिंफोमा भी बच्चों में काफी आम हैं, जिससे गले में गांठ व पेट में गांठ बढ़ जाती है। पांच से कम उम्र के बच्चे किडनी कैंसर का शिकार भी होते हैं, जिसे विल्म्स ट्यूमर भी कहा जाता है। न्यूरोब्लास्टोमा जैसे कैंसर भी एक साल से कम उम्र के बच्चों को होता है लेकिन इससे काफी जल्दी ठीक हुआ जा सकता है। बच्चों में लिवर का कैंसर भी होता है, जिसे हेपाटोब्लास्टोमा कहा जाता है। छोटे बच्चों में आंख का कैंसर भी काफी आम है, जिसे रेटिनोब्लास्टोमा के नाम से जाता है। बच्चों में बोन ट्यूमर भी काफी आम है। बच्चों में होने वाले कैंसर बहुत जल्दी बढते हैं और इलाज की मदद से उन्हें ठीक भी किया जा सकता है।

क्या है ब्लड कैंसर

हमारे शरीर में एक बैनमैरो होता है। जिसमें सफेद सेल जिसे WBC नाम से भी जाना जाता है। जो कि हमारे शरीर को कई हजारों बीमारियों से बचाता है। अगर ये धीरे-धीरे कम हो जाएं या बढ़ जाएं और इनकी जगह ब्लड कैंसर के कण बढ़ जाएं, तो आपकी इम्यूनिटी सिस्टम जवाब दे जाती है। जो कि जानलेवा हो सकता है।

एक स्वस्थ शरीर में सफेद रक्त पेशी(White Blodd Cell) स्वस्थ्य शरीर में 4 से 10 हजार के बीच होती है। वहीं अगर इसकी जगह कैंसरकारी WBC की संख्या बढ़ जाएं, तो वह कैंसर का कारण बनता है।

ब्लड कैंसर 3 प्रकार का होता है।

ल्यूकेमिया

लिंफोमा

मायलोमा

क्या होता है ल्यूकेमिया ब्लड कैंसर?

ल्‍यूकीमिया एक तरह के ब्लड कैंसर की शुरुआती स्टेज है। इसका इलाज आसानी से किया जा सकता है मगर तभी जब इस रोग के शुरुआत में ही इसका पता चल जाए। अगर ठीक समय से इलाज न किया जाए तो ये एक खतरनाक और जानलेवा रोग है। ल्‍यूकीमिया की सही समय पर जांच और चिकित्सा आपको कैंसर से बचा सकती है।

ल्यूकेमिया है खतरनाक

आपको बता दें कि ल्यूकेमिया सीधे आपके ब्लड को प्रभावित करता है। इसके लक्षणों को आसानी से पहचाना जाता है। ल्यूकेमिया का इलाज अगर समय में नहीं करवाते है तो पीड़ित व्यक्ति का जीवन सिर्फ 4 साल होता है। हालांकि यह मरीज की उम्र, प्रतिरोधक क्षमता और ल्यूकीमिया के टाइप पर निर्भर भी करता है। जिसके कारण इसका इलाज इसके टाइप के अनुसार किया जाता है।

ल्यूकेमिया ब्लड कैंसर के लक्षण

दौरा पड़ना या किसी चीज के होने का बार-बार भ्रम होना। यानी कई बार रोगी मानसिक रूप से परेशान रहने लगता है।

उल्टियां आने का अहसास होना या असमय उल्टियां होना।

त्वचा में जगह-जगह रैशेज की शिकायत होना।

ग्रंथियों/ग्लैंड्स का सूज जाना।

अचानक से बिना कारणों के असामान्य रूप से वजन का कम होना।

जबड़ों में सूजन आना या फिर रक्‍त का बहना।

भूख ना लगने की समस्या होना।

यदि चोट लगी है तो चोट का निशान पड़ जाना।

किसी घाव या जख्म के भरने में अधिक समय लग जाना।

बार-बार एक ही तरह का संक्रमण होना।

बहुत तेज बुखार होना।

रोगी का इम्यून सिस्टम कमजोर होना।

हर समय थकान और कमजोरी महसूस करना।

एनीमिया होना।

नाक-मसूड़ों इत्यादि से खून बहने की शिकायत होना।

प्लेटलेट्स का गिरना।

ल्यूकेमिया की पहचान कैसे करें

ब्लड टेस्ट
काफी हद तक इसकी पहचान ब्लड टेस्ट से हो सकती है। जिसमें आपको WBC देखने पड़ेगा।

बोन मैरो टेस्ट
अगर ब्लड टेस्ट के टेस्ट में WBC कम होते है या फिर ज्यादा होते है। जो फिर बोन मैरो टेस्ट किया जाता है। इसमें पेडू से हड्डी पानी निकालकर इसका टेस्ट किया जाता है। जो कि थोड़ा दर्द वाला होता है। इससे पूर्ण रुप से सटिक आता है कि ब्लड कैंसर है कि नहीं।

भारत में बच्चों के कैंसर के लिए उपचार के विकल्प क्या हैं?

बच्चों के कैंसर में आमतौर पर इलाज तीन तरीके से किया जाता है। जिसमें पहला है कीमोथेरेपी, जिसमें नसों के जरिए दवाओं को शरीर में पहुंचाया जाता है। कई बार ओरल दवाओं की मदद से भी इलाज किया जाता है। ज्यादातर बच्चों के कैंसर में कीमोथेरेपी की जरूरत होती है। हो सकता है किसी कैंसर में इलाज की प्रक्रिया में सर्जरी का इस्तेमाल भी किया जाए। जो गांठ को हटाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। वहीं रेडिएशन थेरेपी का उपयोग ब्रेन ट्यूमर, लिंफोमा या विल्म्स ट्यूमर जैसे कैंसर के लिए किया जाता है। यदि कैंसर बढ़ जाए तो रेडिएशन थेरेपी की आवश्यकता होती है। आमतौर पर इसका इस्तेमाल कम ही होता है। बच्चों में कैंसर के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट का इस्तेमाल भी किया जाता है।

बच्चों के लिए उपचार के दुष्प्रभाव क्या हैं?

इलाज के दौरान और बाद में बच्चों को कुछ दुष्प्रभावों का सामना करना पडता है। बच्चे इस बड़ों के मुकाबले इस इलाज को काफी अच्छे से सहन कर लेते हैं। एक कैथेटर की बच्चों को दे देते हैं। जिससे मतली की समस्या कम हो जाती है। आमतौर पर दवाओं के चलते बच्चों के सिर से बाल चले जाते हैं। इलाज के दौरान 10 से 12 साल के बच्चों का जीवन काफी प्रभावित होता है। क्योंकि वह इलाज के चलते अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। जिसके लिए उनकी काउंसलिंग की जाती है। उल्टी, मुंह में छाले, बुखार जैसे दुष्प्रभाव लंबे वक्त तक नहीं रहते हैं। कुछ दुष्प्रभाव होते हैं, जो लंबे वक्त के बाद आते हैं, जैसे कि 15 से 20 साल के बाद कुछ दवाओं के कारण दिल की बीमारी होने की संभावना होती है। कुछ दवाओं से बांझपन की समस्या हो सकती है। इन सभी दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर दवाओं का डोज दिया जाता है।

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