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द्रोणाचार्य

कुरुवंशी कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य थे। परन्तु इनका वास्तविक परिचय क्या था?

द्रोणाचार्य महर्षि भारद्वाज तथा घृतार्ची नामक अप्सरा के पुत्र थे। गुरु बृहस्पति व अंगीरा वंशी तथा धर्नुविद्या में निपुण भगवान परशुराम के शिष्य थे। कुरू प्रदेश में पांडु के पाँचों पुत्र तथा धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के वे गुरु थे। महाभारत युद्ध के समय वह कौरव पक्ष के सेनापति थे। गुरु द्रोणाचार्य के अन्य शिष्यों में एकलव्य का नाम उल्लेखनीय है। उसने गुरुदक्षिणा में अपना अंगूठा द्रोणाचार्य को दे दिया था। कौरवो और पांडवो ने द्रोणाचार्य के आश्रम मे ही अस्त्रो और शस्त्रो की शिक्षा पायी थी। अर्जुन द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य थे। वे अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते थे। गुरु द्रोण के पुत्र का नाम अश्वस्थामा है और अपने पुत्र की वजह से ही वे कौरवों और पांडवों के गुरु बनने को तैयार हुए थे।

महाभारत की कथा के अनुसार महर्षि भारद्वाज जब एक बार नदी ने स्नान करने गए। महर्षि भारद्वाज का वीर्य स्खलित हो गया वे इसे द्रोणी (यज्ञकलश अथवा पर्वत की गुफ़ा) में रख कर जंगल में छोड़ आये दूसरे दिन महर्षि ने देखा की वहाँ एक शिशु रो रहा है। द्रोणी में जन्म होने से इन्हें द्रोण कहा गया। ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि भारद्वाज ने गंगा में स्नान करती घृताची को देखा, आसक्त होने के कारण जो वीर्य स्खलन हुआ, उसे उन्होंने द्रोण (यज्ञ कलश) में रख दिया। उससे उत्पन्न बालक द्रोण कहलाया। द्रोण का जन्म उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में बताया जाता है, जिसे ‘देहराद्रोण’ (मिट्टी का सकोरा) भी कहते थे।

द्रोणाचार्य भारद्वाज मुनि के पुत्र; संसार के श्रेष्ठ धनुर्धर थे। अपने पिता के आश्रम में ही रहते हुये वे चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो गये। महर्षि भारद्वाज ने सबसे पहले आग्नेयास्त्र की शिक्षा शिष्य अग्निवेश्य को दे दी थी। फिर अपने गुरु भारद्वाज की आज्ञा से ही अग्निवेश्य ने द्रोणाचार्य को आग्नेयास्त्र की शिक्षा दी थी।

वेद-वेदांगों में पारंगत तथा तपस्या के धनी द्रोण का यश थोड़े ही समय में चारों ओर फैल गया। द्रोण के साथ प्रषत् नामक राजा के पुत्र द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तथा दोनों में प्रगाढ़ मैत्री हो गई। उन्हीं दिनों परशुराम अपनी समस्त सम्पत्ति को ब्राह्मणों में दान कर के महेन्द्राचल पर्वत पर तप कर रहे थे। एक बार द्रोण उनके पास पहुँचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया। इस पर परशुराम बोले, “वत्स! तुम विलम्ब से आये हो, मैंने तो अपना सब कुछ पहले से ही ब्राह्मणों को दान में दे डाला है। अब मेरे पास केवल अस्त्र-शस्त्र ही शेष बचे हैं। तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो।” द्रोण यही तो चाहते थे अतः उन्होंने कहा, “हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर के मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी, किन्तु आप को मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा-दीक्षा देनी होगी तथा विधि-विधान भी बताना होगा।” इस प्रकार परशुराम के शिष्य बन कर द्रोण अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये। उन्होंने शस्त्र प्रयोग, रहस्य तथा संहारविधि के सहित श्री परशुराम जी से सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया।

शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात द्रोण का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हो गया। कृपी से उनका एक पुत्र हुआ। यह महाभारत का वह महत्त्वपूर्ण पात्र बना जिसका नाम अश्वत्थामा था। द्रोणाचार्य ब्रह्मास्त्र का प्रयोग जानते थे जिसके प्रयोग करने की विधि उन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा को भी सिखाई थी। द्रोणाचार्य का प्रारंभिक जीवन गरीबी में कटा था। अत्यन्त शोचनीय आर्थिक स्थिति होने के कारण जब अश्वत्थामा ने अपनी माँ से दूध पीने को माँगा तो कृपि ने अपने पुत्र को पानी में आटा घोलकर दूध बताकर पीने को दे दिया। द्रोणाचार्य को इस बात का पता चलने पर अपार कष्ट हुआ, उन्हें द्रुपद का आधा राज्य देने का वचन याद आया और अपने मित्र पांचाल नरेश द्रुपद से मिलने गए। आचार्य द्रोण ने द्रुपद से कहा, ‘‘राजन! मैं आपका बालसखा द्रोण हूं। मैं आपसे मिलने के लिए आया हूं।’’ द्रुपद उस समय ऐश्वर्य के मद में चूर थे। उन्होंने द्रोण से कहा, ‘‘तुम मूढ़ हो, पुरानी लड़कपन की बातों को अब तक ढो रहे हो, सच तो यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान का, मूर्ख विद्वान का तथा कायर शूरवीर का मित्र हो ही नहीं सकता।’’ ये कहकर द्रुपद ने द्रोणाचार्य को अपनी राज्यसभा में अपमानित किया। द्रुपद की बातों से अपमानित होकर द्रोणाचार्य वहां से उठकर हस्तिनापुर की ओर चल दिए।

एक बार द्रोणाचार्य जब वन भ्रमण पे थे कि पास के ही एक कुएँ में एक गेंद जा गिरी। उसी गेंद से हस्तिनापुर के कौरव-पांडव कुमार परस्पर आपस में ही खेल रहे थे। आचार्य द्रोण को ऊधर से जाते हुए देखकर राजकुमारों ने उनसे कुएँ में गिरे उस गेंद को निकालने की प्रार्थना की। आचार्य द्रोण ने अपने धनुषर्विद्या की कुशलता से पलभर में ही मुट्ठी भर सींक के बाणों से गेंद को निकाल दी।

इसके बाद एक राजकुमार ने अपनी अंगूठी कुएं में डाल दी। आचार्य ने उसी विधि से अंगूठी भी निकाल दी। द्रोणाचार्य के इस अस्त्रकौशल को देखकर राजकुमार आश्चर्यचकित रह गए। राज कुमारों ने कहा, ‘‘ब्राह्मण! हम आपको प्रणाम करते हैं। यह अद्भुत अस्त्र कौशल संसार में आपके अतिरिक्त और किसी के पास नहीं है। कृपया आप अपना परिचय देकर हमारी जिज्ञासा शांत करें।’’

द्रोण ने उत्तर दिया, ‘‘मेरे रूप और गुणों की बात तुम लोग भीष्म से कहो। वही तुम्हें हमारा परिचय बताएंगे।’’ राजकुमारों ने जाकर सारी बातें भीष्म जी से बताईं। इस अद्भुत प्रयोग के विषय में तथा समस्त विषयों मे प्रकाण्ड पण्डित होने के विषय में ज्ञात होने पर भीष्म पितामह समझ गए कि द्रोणाचार्य के अतिरिक्त यह कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है। राजकुमारों के साथ आकर भीष्म ने आचार्य द्रोण का स्वागत किया और उनको आचार्य पद पर प्रतिष्ठित करके राज कुमारों की शिक्षा-दीक्षा का कार्य सौंप दिया और उन्हें कुरु राजकुमारों के उच्च शिक्षा का आचार्य नियुक्त कर राजाश्रय में ले लिया और वे द्रोणाचार्य के नाम से विख्यात हुये।

भीष्म ने आचार्य के निवास के लिए धन-धान्य से पूर्ण सुंदर भवन की भी व्यवस्था कर दी। आचार्य द्रोण वहां रह कर शिष्यों को प्रीतिपूर्वक शिक्षा देने लगे। धीरे-धीरे पांडव और कौरव राजकुमार अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण हो गए। अर्जुन धनुर्विद्या में सबसे अधिक प्रतिभावान निकले। आचार्य द्रोण के कहने पर उन्होंने द्रुपद को युद्ध में परास्त करके और उन्हें बांध कर गुरु दक्षिणा के रूप में गुरु चरणों में डाल दिया। अत: वह द्रोणाचार्य के अधिक प्रीतिभाजन बन गए।

अर्जुन पर गुरुदेवजी की विशेष कृपा है, यह बात द्रोणाचार्यजी के अन्य शिष्यों को सहन नहीं होती थी। इसलिए, वे सब अर्जुन की उपेक्षा करते थे। एक समय, द्रोणाचार्यजी अर्जुनसहित अपने शिष्यों को लेकर स्नान करने के लिए नदीपर गए और वटवृक्ष के नीचे खडे होकर बोले, ‘अर्जुन, मै आश्रम में अपनी धोती भूलकर आया हूँ। जाओ, तुम उसे लेकर आओ।

गुर्वाज्ञा के कारण अर्जुन धोती लाने के लिए आश्रम गया, उस समय गुरु द्रोणाचार्यजी ने कुछ शिष्यों से कहा, ‘गदा एवं धनुष्य में शक्ति होती है; परंतु मंत्र में उससे अधिक शक्ति होती है। मंत्रजाप करनेवाले इसका महत्त्व एवं पद्धति समझ लें, तो मंत्र में अधिक सामर्थ्य होता है, यह बात वे समझ जाएंगे। मैं अभिमंत्रित एक ही बाण से इस वटवृक्ष के सब पत्तियों को छेद सकता हूँ। यह कहकर, द्रोणाचार्यजी ने भूमिपर एक मंत्र लिखा एवं उसी मंत्र से अभिमंत्रित एक बाण छोड़ा। बाण ने वृक्ष के सभी पत्तों को छेद दिया। यह देखकर, सब शिष्य आश्चर्य में पड गए ।

इसके पश्चात गुरु द्रोणाचार्यजी सब शिष्यों के साथ स्नान करने गए। उसी समय अर्जुन धोती लेकर आया। उसकी दृष्टि वृक्ष की पत्तियोंपर पडी। वह सोचने लगा। इस वटवृक्ष की पत्तियोंपर पहले तो छेद नहीं थे। ज्ञात होता है जब मैं गुरु सेवा को गया था, उस समय गुरुदेवजी ने शिष्यों को एक रहस्य बताया होगा। रहस्य बताया होगा, तो उसके कुछ सूत्र होंगे, प्रारंभ होगा, इसके चिह्न भी होंगे। अर्जुन ने इधर-उधर देखा, तो उसे भूमिपर लिखा हुआ मंत्र दिखाई दिए। वृक्षच्छेदन के सामर्थ्य से युक्त यह मंत्र अद्भुत है, यह बात उसके मन में समा गई। उसने यह मंत्र पढना आरंभ किया। जब उसके मन में दृढ विश्वास उत्पन्न हो गया कि यह मंत्र निश्चित सफल होगा, तब उसने धनुष्यपर बाण चढाया और मंत्र का उच्चारण कर छोड दिया। इससे वटवृक्ष की पत्तियोंपर, पहले बने छेद के समीप दूसरा छेद बन गया। यह देखकर अर्जुन को अत्यंत आनंद हुआ। गुरुदेवजी ने अन्य शिष्यों को जो विद्या सिखाई, वह मैंने भी सीख ली, ऐसा विचार कर, वह गुरुदेवजी को धोती देने के लिए नदी की ओर चल पड़ा ।

स्नान से लौटने के पश्चात जब द्रोणाचार्यजी ने वटवृक्ष की पत्तियोंपर दूसरा छेद देखा, तो उन्होंने अपने साथ के सभी शिष्यों से प्रश्न किया कि “स्नान से पहले वटवृक्ष की सभी पत्तियोंपर एक छेद था। अब दूसरा छेद आप में से किसने किया?” वहाँ खड़े सभी शिष्यों ने कहा- “हमने नहीं किया।”

फिर द्रोणाचार्य अर्जुन की ओर देखकर पूछ पड़े “अर्जुन यह कार्य तुमने किया है क्या?” अर्जुन कुछ डरते हुये कहा- “हाँ गुरुजी, मैंने आपकी आज्ञा के बिना ही आपके मंत्र का प्रयोग किया। क्योंकि, मुझे लगा कि आपने इन सबको यह विद्या सिखा दी है, तो आपसे इस विषय में पूछकर आपका समय न गंवाकर अपनेआप सीख लूं। गुरुदेवजी, मुझसे चूक हुई हो, तो क्षमा कीजिएगा।”

अर्जुन की बात सुनकर द्रोणाचार्य ने कहा “नहीं अर्जुन, तुम में जिज्ञासा, संयम एवं सीखने की लगन है। उसी प्रकार, मंत्र पर तुम्हारा विश्वास है। मंत्रशक्ति का प्रभाव देखकर सब केवल चकित होकर स्नान करने चले गए। उनमें से एक ने भी दूसरा छेद करने का विचार भी नहीं किया। तुम धैर्य दिखाकर एवं प्रयत्न कर उत्तीर्ण हो गए। तू मेरा सर्वोत्तम शिष्य है। अर्जुन, तुमसे श्रेष्ठ धनुर्धर होना असंभव है। शिष्य जितना ही जिज्ञासू हो तो गुरु का अंतःकरण अभिमान से दुगुना भर जाता है।”

द्रोणाचार्य मनोयोग से उन सबको शस्त्र-विद्या सिखाने लगे, किंतु अपने पुत्र पर उनका विशेष ध्यान रहता था। वे अन्य सब शिष्यों को कमंडलु देते तथा अश्वत्थामा को चोड़े मुँह का घड़ा। इस प्रकार अश्वत्थामा अन्य सबकी अपेक्षा बहुत जल्दी पानी भरकर ले आते, अत: अन्य शिष्यों के आने से पूर्व वे अश्वत्थामा को अस्त्र-शस्त्र संचालन सिखा देते। अर्जुन ने यह बात भांप ली। वह वरुणास्त्र से तुरंत ही कुंमडलु भरकर प्रस्तुत कर देता। अत: वह अश्वत्थामा से पीछे नहीं रहा। गुरुदक्षिणा एक बार भोजन करते समय हवा से दीपक बुझ गया, परंतु अभ्यासवश हाथ बार-बार मुँह तक ही पहुँचता था। इस तथ्य की ओर ध्यान देकर अर्जुन ने रात्रि में भी धनुर्विद्या का अभ्यास प्रारंभ कर दिया। वह द्रोण का अत्यंत प्रिय शिष्य था। द्रोण ने एकलव्य को शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया था क्योंकि वे अर्जुन को धनुर्विद्या में अद्वितीय बनाये रखना चाहते थे। निषाद बालक एकलव्य जो कि अद्भुत धर्नुधर बन गया था। वह द्रोणाचार्य को अपना इष्ट गुरु मानता था और उनकी मूर्ति बनाकर उसके सामने अभ्यास कर धर्नुविद्या में पारंगत हो गया था अर्जुन के समकक्ष कोई ना हो जाए इस कारण द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा के रूप में दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया। एकलव्य ने हँसते हँसते अँगूठा दे दिया। द्रोणाचार्य ने कर्ण की प्रतिभा को पहचान लिया था और उसे भी सूतपुत्र बता शिक्षा देने से मनाकर दिया था।

पिता द्रोणाचार्य से अश्वत्थामा ने #धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। द्रोण ने अपने पुत्र अश्‍वत्थामा को धनुर्वेद के सारे रहस्य बता दिए थे। सारे दिव्यास्त्र, आग्नेय, वरुणास्त्र, पर्जन्यास्त्र, वायव्यास्त्र, ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, ब्रह्मशिर आदि सभी शास्त्रों को अश्वत्थामा ने पिता द्रोणाचार्य से सिद्ध किऐ थे और वह भी पिता द्रोण, भीष्म, परशुराम की कोटि का धनुर्धर बन गया। कृप, अर्जुन व कर्ण भी उससे अधिक श्रेष्ठ नहीं थे। उस काल में नारायणास्त्र एक ऐसा अस्त्र था ‍जिसका ज्ञान द्रोण व अश्वत्थामा के अलावे महाभारत के अन्य किसी योद्धा को नहीं था। यह बहु‍त ही विध्वंसकारी अस्त्र था।

ऋषिकुल पुत्र प्रेम परंपरा को छोड़ गुरुकुल परंपरा में द्रोणाचार्य के प्रियतम शिष्य तो सर्वश्रेष्ठ पांडव वीर अर्जुन ही थे। गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनते देखना चाहते थे और फिर इसी शिष्य अर्जुन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य के अपमान का बदला राजा द्रुपद से भी लिया। द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा के रूप में शिष्यों से राजा द्रुपद को बंदी बना लाने के लिए कहा था। जब अर्जुन ने ऐसा कर दिखाया तो ऐसा होने पर राजा द्रुपद का आधा राज्य उसे वापस लौटाते हुए द्रोण ने कहा- तुम कहते थे कि राजा ही राजा का मित्र हो सकता है, अत: आज से तुम्हारा आधा राज्य मेरे पास रहेगा और दोनों राजा होने के कारण मित्र भी रहेंगे। द्रुपद अत्यंत लज्जित स्थिति में अपने राज्य की ओर लौटा। द्रोण ने अर्जुन से गुरुदक्षिणा-स्वरूप यह प्रतिज्ञा भी करवाई थी कि यदि खुद गुरु द्रोण भी उसके विरोध में खड़े होंगे तो वह युद्ध करेगा, अपने धर्म रक्षा व कर्तव्य निष्ठा से कभी भी पीछे नहीं हटेगा।

महाभारत युद्ध के मध्य दिवसों में धर्मवीर अर्जुन के बाणों से छलनी भीष्म पितामह के शरशय्या पर गिरने के बाद गुरु द्रोणाचार्य कौरव-सेना के दूसरे सेनापति बनाए गए थे। वह सशरीर कौरवों के साथ रहते हुए भी हृदय से धर्मात्मा पांडवों की विजय ही चाहते थे। उन्होंने महाभारत के युद्ध में अद्भुत पराक्रम भी प्रदर्शित किया था। युद्ध में अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार सुनकर उन्होंने शस्त्र का त्याग कर दिया और धृष्टद्युम्र के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए।

महाभारत युद्ध चक्रव्यूह रचना में द्रोणाचार्य यद्यपि कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे थे तथापि उनका मोह पांडवों के प्रति ही था, ऐसा दुर्योधन बार-बार अनुभव करता था। द्रोण के सर्वतोप्रिय शिष्यों में केवल पांडव वीर अर्जुन ही थे। इसके बावजूद उन्होंने समय-समय पर अनेक प्रकार के व्यूहों की रचना की। उनके बनाये व्यूह को तोड़ने में ही अर्जुन पुत्र अभिमन्यु भी मारा गया। महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह के बाद मुख्य सेनापति का पद द्रोणाचार्य को ही प्राप्त हुआ था।

अर्जुन ने क्रुद्ध होकर जयद्रथ को मारने की ठानी, क्योंकि उसने पांडवों को व्यूह में प्रवेश नहीं करने दिया था और अनेक रथियों ने अकेले अभिमन्यु को घेरकर मारा था जो कि युद्ध-नियमों के विरुद्ध था। जब ये बात अर्जुन को ज्ञात हुआ तो उसने अगले दिन सायं तक जयद्रथ को मारने अथवा आत्मदाह कर लेने की शपथ लीं अत: द्रोण ने जयद्रथ की सुरक्षा के लिए चक्रशकट व्यूह का निर्माण किया तथापि अर्जुन तथा श्रीकृष्ण ने अगले दिन संध्या से पूर्व जयद्रथ को मार डाला। श्रीकृष्ण ने माया से अंधकार फैला दिया। कौरवगण रात्रि का आगमन समझकर निश्चित हो गये और जयद्रथ को तब तक सुरक्षित देख अर्जुन के आत्मदाह की कल्पना करने लगे, तभी अर्जुन ने जयद्रथ को मार डाला।

पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु से शोकातुर पांडवों ने रात्रि में भी युद्ध का कार्यक्रम नहीं समेटा तथा सामूहिक रूप से द्रोण पर आक्रमण कर दिया। अधर्म पर आधारित पंद्रहवें दिन से पूर्व की रात्रि में द्रोण से युद्ध करते हुए द्रुपद के तीन पौत्र, द्रुपद तथा विराट आदि मारे गये। द्रोण दुर्योधन के वाक्बाणों से क्रुद्ध हो उठे थे, अत: उन्होंने अनेकों पांचाल सैनिकों को नष्ट कर डाला। जो भी रथी सामने आता, द्रोण उसी को नष्ट कर डालते। उन्हें क्षत्रियों का इस प्रकार विनाश करते देख अंगिरा, वसिष्ठ, कश्यप आदि अनेक ऋषि उन्हें ब्रह्मलोक ले चलने के लिए वहाँ पहुँचे। उन्होंने द्रोण से युद्ध छोड़ देने का अनुरोध किया, साथ ही यह भी कहा कि उनका युद्ध अधर्म पर आधारित है।

ब्रह्मास्त्र को प्रयोग करने की विधि द्रोणाचार्य ने अपने पुत्र अश्वत्थामा को भी सिखा रखी थी, जिसका प्रयोग उसने महाभारत के बाद पाडंवों के वंश का समूल नाश करने हेतु अर्जुन की पुत्रवधू उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिए किया था। कृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में जाकर अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित की रक्षा की, क्योंकि सम्पूर्ण कुरु वंश के अन्तिम राजा परीक्षत ही थे। दूसरी ओर श्रीकृष्ण ने पांडवों को कह-सुनकर तैयार कर लिया कि वे द्रोण तक अश्वत्थामा के मर जाने का संदेश पहुँचा दें। भले ही यह असत्य है। इसके अतिरिक्त युद्धधर्म से उन्हें विरक्त करने का कोई अन्य उपाय यनहीं जान पड़ता। कालांतर में भीम ने मालव नरेश इंद्रवर्मा का अश्वत्थामा नामक हाथी मार डाला। द्रोणाचार्य की मृत्यु भीम ने द्रोण को ‘अश्वत्थामा मार डाला गया है’- यह समाचार दिया। द्रोण अपने बेटे के बल से परिचित थे, अत: उन्होंने धर्मावतार युधिष्ठिर से इस समाचार की पुष्टि करने के लिए कहा।

युधिष्ठिर ने ज़ोर से कहा- अश्वत्थामा मारा गया और साथ ही धीरे से यह भी कह दिया ‘हाथी का वध हुआ है।’ उत्तरांश द्रोण ने नहीं सुना तथा पुत्र शोक से संतप्त हो उनकी चेतना लुप्त होने लगी। वे अनमने से धृष्टद्युम्न से युद्ध कर रहे थे, तब भीम ने पुन: जाकर कहा- तुम अपने एक पुत्र की जीविका के लिए ब्राह्मण होकर भी यह हत्याकांड कर रहे हो, वह पुत्र तो अब रहा भी नहीं। द्रोण आर्तनाद कर उठे तथा कौरवों को पुकारकर कहने लगे कि अब युद्ध का कार्यभार वे लोग स्वयं ही संभाले। सुअवसर देखकर धृष्टद्युम्न तलवार लेकर उनके रथ की ओर लपका। द्रोण ने अस्त्र त्यागकर ‘ॐ’ का उच्चारण किया तथा उनके ज्योतिर्मय प्राण ब्रह्मलोक की ओर बढ़ते हुए आकाश में अदृश्य हो गये। इस अवस्था में उनके मस्तक के बाल पकड़कर धृष्टद्युम्न ने सबके मना करते हुए भी चार सौ वर्षीय द्रोण के सिर को धड़ से काट गिराया।

अर्जुन कहता ही रह गया कि आचार्य को मारो मत, जीवित ही ले जाओ। वास्तव में राजा द्रुपद ने एक महान यज्ञ में देवाराधन करके द्रोणाचार्य का विनाश करने के लिए धृष्टद्युम्न नामक राजकुमार को प्रज्वलित अग्नि से प्राप्त किया था। द्रोण को मृत देख कौरवों के अधिकांश सेनापति ससैन्य युद्धक्षेत्र से भागते हुए दिखलायी पड़ने लगे।

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