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दोहरा चरित्र – मार्कण्डेय त्रिपाठी (कवि)

दोहरा चरित्र

काम भले वे कम करते हैं ,
किन्तु प्रचार अधिक करते हैं ।
भीतर से हैं भले विधर्मी ,
पर बाहर प्रभु पर मरते हैं ।।

रहते नहीं, दिखाते हैं वे ,
अपनी सज्जनता की क्रीड़ा ।
आदर वे बहुविधि पाते हैं ,
यह सचमुच समाज की पीड़ा ।।

चेहरे पर मुस्कान लिए वे ,
दिवस, रात्रि विचरण करते हैं ।
उनके उर में गरल भयंकर ,
अपने भी उनसे डरते हैं ।।

यह उनका दोहरा चरित्र है ,
यही है उनकी सफल कहानी ।
जिसको डस लेते हैं सच में,
नहीं मांगता फिर से पानी ।।

आगे, पीछे चलती रहती ,
उनके अंधभक्तों की टोली ।
हुआं, हुआं करती रहती है ,
उनकी रोज दिवाली, होली ।।

हर पल भेष बदलते रहते ,
हर क्षण बदला करते भाषा ।
अद्भुत ज्ञान भरा है उनमें ,
याद उन्हें सारी परिभाषा ।।

अप्रतिम छबि है समाज में ,
समझाते वे जीवन दर्शन ।
भले ही शिक्षा रही अधूरी ,
करते सतत् ज्ञान का वर्षण ।।

लौकिक, पारलौकिक दोनों की,
अद्भुत विद्या उनमें आई ।
जो कह दें वह रामबाण है ,
उनकी सबसे बड़ी दवाई ।।

हिम्मत नहीं किसी की पड़ती ,
जो उनके आगे मुंह खोले ।
उनकी अपनी पृथक् राय है,
हमें बचाना बम,बम,भोले ।।

समझ गये क्या आप ,
बताता हूं जिनकी मैं अमर कहानी ।
सोचें, समझें, ध्यान लगाएं ,
गाथा है जानी, पहचानी ।।

आज आपके आस पास ही,
ऐसे सज्जन मिल जाएंगे ।
मुंह में राम,बगल में छूरी ,
हाथ मिलाकर भरमाएंगे ।।

जरा संभलकर रहना इनसे ,
कभी न मन की बात बताना ।
वरना सब कुछ खो बैठोगे ,
बहुत बुरा है आज जमाना ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी (कवि)

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