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देश की पहली महिला पैरा शूटिंग चैंपियन दिलराज कौर सड़क पर नमकीन और बिस्किट बेचने पर मजबूर

 

देश को पदक दिलाकर देश का नाम विश्व में जगमगाने वाले देश के सच्चे खिलाड़ी आज गरीब हैं और गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं. देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी है पर कोई भी भारतीय, किसी हॉकी खिलाड़ी को नहीं जनता, ना ही सरकार उन्हें बढ़ावा देने का प्रयास करती है. यही हाल फुटबाल और अन्य खेलों के खिलाड़ियों का है. ओलंपिक में क्रिकेट से शान नहीं बढ़ती इन एथलीट के प्रदर्शन से देश का गौरव बढ़ता है। इरफान की फ़िल्म पान सिंह तोमर में भी देश के खिलाड़ियों की दुर्दशा दिखाई थी. कोरोना काल में भी सरकार क्रिकेट पर करोड़ों खर्च कर रही है. लेकिन देश को गौरवान्वित करने वाले उन खिलाड़ीयों को पदक देकर सरकार भूल गयी जो वाकई में भारत के गौरव हैं. सरकार को इनकी भी सुध लेनी चाहिए. कोई खिलाड़ी मजदूर बन गया तो कोई गरीबी में ही गुजर गया. आखिर सरकार और जनता को देश से कोई मतलब नहीं रहा क्या?

आज भारत की पहली महिला पैरा शूटिंग चैंपियन सड़क पर नमकीन-बिस्किट बेचने को मजबूर, जानें क्या है उनकी कहानी?

देश की पहली महिला पैरा शूटिंग चैंपियन दिलराज कौर सड़क पर नमकीन और बिस्किट बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रही हैं. उन्होंने कई बार सरकार से नौकरी की गुहार लगाई है, लेकिन सरकार इस बात की सुध ही नहीं ले रही.

“सोचा था कि जब देश का नाम रोशन होगा तो शायद मेरे घर मे भी थोड़ा उजाला जरूर होगा, पर शायद ऐसा नसीब नहीं था. जब देश को जरूरत थी तब मैं थी, पर अब मेरी जरूरत पर कोई नहीं. सिर्फ इस अंधेरे के…” ये बातें है देश को पहली बार महिला पैरा शूटिंग चैंपियनशिप में चैंपियन बनाने वालीं दिलराज कौर की. दिलराज कौर इन दिनों अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए सड़कों पर नमकीन और बिस्किट बेचने को मजबूर हैं.

दिलराज कौर देश की पहली महिला पैरा शूटिंग चैंपियन हैं, जिन्होंने देश को न जाने कितने मेडल दिलवाए, मगर आज देश ने ही उनको भुला दिया. जिसने महिला पैरा शूटिंग चैंपियन देश के लिए गोल्ड मेडल जीता, अब वही महिला भिखारियों की तरह जीने को मजबूर है. दिलराज कौर इन दिनों देहरादून में गांधी पार्क के पास नमकीन और बिस्किट बेचकर अपने परिवार का पेट पाल रही हैं.

कई मेडल जीते, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब
देहरादून के गोविंदगढ़ की रहने वालीं दिलराज कौर अंतरराष्ट्रीय पैरालंपिक शूटर हैं. उन्होंने दो दर्जन से ज्यादा गोल्ड मेडल जीते हैं. लेकिन अब दिलराज किराए की मकान में अपनी माता गुरबीत कौर के साथ रहती हैं और आर्थिक तंगी के कारण गांधी पार्क के पास नमकीन-बिस्किट बेच रहीं हैं.

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