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क्या पाना था, क्या पाया है, सोच जरा तू, ऐ इंसान” || – (कवि : कैलाशनाथ गुप्ता)

क्या पाना था, क्या पाया है, सोच जरा तू, ऐ इंसान” ||

१- कुछ पाने की, चाह में मानव,हरदम कोशिश करता है
नफा और नुकसान में देखो, हरपल उलझा रहता है
कुछ पाएं कुछ बन जाए हम, ये हसरत मन में रहता है
पर वक्त से पहले,इस दुनिया में,कहीं किसीको,मिलता है
समय से पहले,भाग्य से ज्यादा,सतगुरु के दर है आसान
क्या पाना था, क्या पाया है, सोच जरा तू, ऐ इंसान

२- सुख का साधन, खोज रहा है, क्यों बहुत सामानों मे
भौतिक सुख सुविधा है, सीमित रोटी कपड़ा मकानों में
भौतिकता की, चमक दमक है, आज हर, इंसानों में
चांद को भी, मुट्ठी में भर ले, है जज्बा नौजवानों में
चांद मंगल पर, सब कोई जाए पर रखना है, इतना ध्यान
क्या पाना था, क्या पाया है, सोच जरा तू, ऐ इंसान

३- इस दुनिया, में रहकर जिसने, पाया नहीं हे, प्रभु का ज्ञान
सब कुछ पाकर, भी ईस जग में, वो बन नहीं पाया है इंसान
प्रभु ज्ञान, इंसान बनाता, कहते हैं, सब वेद – पुराण
प्रभु ज्ञान, का दाता सदगुरू, नहीं है कोई, और विधान
कैलाश, प्रभु का, ज्ञान हो सबको, हो सबको रब की पहचान
क्या पाना था, क्या पाया है, सोच जरा तू, ऐ इंसान

कैलाश नाथ गुप्ता – अंधेरी मुंबई
9324673661

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