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कठोपनिषद में वर्णित नचिकेता कथा

।।ॐ अशन् ह वै वाजश्रवस: सर्ववेदसं ददौ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥
गौतमवंशी उद्दालक (आरुणि)के पिता महर्षि अरुण(वाजश्रवा)थे। आरुणि उद्दालक ने विश्वजित यज्ञ किया। उद्दालक के पुत्र का नाम नचिकेता था। जो अत्यन्त बुद्धिमान एवं सात्त्विक था।
प्राचीन काल में यज्ञ करना और दक्षिणा आदि में दान देना एक पुण्यकार्य माना जाता था। विश्वजित एक महान यज्ञ था जिसमें सारा धन दान देकर रिक्त हो जाना गौरवमय माना जाता था। महर्षि उद्दालक ने विश्वजित यज्ञ किया और सर्वस्व दान करने का संकल्प लिया। उनका पुत्र नचिकेता सब कुछ देख रहा था। उस काल में अधिकांश ऋषिगण गृहस्थ होते थे और वनों में रहा करते थे। प्राय: गौएं ही उनकी धन-सम्पति होती थी।
।।तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानसु श्रद्धा आविवेश सोऽमन्यत ॥
जिस समय दक्षिणा के लिए गौओं को ले जाया जा रहा था, तब छोटा बालक होते हुए भी उस नचिकेता में श्रद्धाभाव (ज्ञान-चेतना, सात्त्विक-भाव) उत्पन्न हो गया तथा उसने चिन्तन-मनन प्रारंभ कर दिया। नचिकेता में श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता थी।
नचिकेता एक पांच वर्षीय बालक था। उसके पिता ने यज्ञ में संकल्प किया कि वे अपना सर्वस्व दान कर देंगे। लेकिन बाद में वो बीमार गायें दान करने लगे। नचिकेता को यह अच्छा नहीं लगा कि बीमार और बूढी गाय दान की जा रही हैं। नचिकेता ने पिता से कहा- ‘यह आपने उचित कार्य नहीं किया। अगर आप कुछ नहीं देना चाहते थे, तो आपको पहले यह नहीं कहना चाहिए था। आप बताइए कि आप मुझे किसको दान देंगे?’
पिता को क्रोध आ गया और बोले-‘मैं तुम्हें यम देवता को दूंगा।’ बालक, अपने पिता की बात सुनकर स्वयं यम के पास चला गया। यम, उस समय यमलोक में नहीं थे। नचिकेता तीन दिन तक भोजन-पानी के बिना यम के द्वार पर इंतजार करता रहा। तीन दिन बाद जब यम लौटे तो उन्होंने भूखे, लेकिन पक्के इरादे वाले छोटे से बालक को देखा। यमदेव ने बालक नचिकेता से कहा –
।।तिस्त्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्य:।
नमस्ते अस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति में अस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् बरान् वृणीष्व॥
‘हे! ब्राम्हण देव, मुझे यह अच्छा लगा कि तुम तीन दिन से मेरा इंतजार कर रहे हो। मैं, तुम्हें तीन वरदान देता हूं।
नचिकेता ने कहा-
।।शान्तसकल्प: सुमना यथा स्याद्वीतमन्युगौर्तमों माभि मृत्यो।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे।।
हे देव! पहला वरदान तो आप यह दें कि मेरे पिता का क्रोध शांत हो जाएं और वे मुझे पहले जैसा प्यार करें।’
नचिकेता ने दूसरा वरदान मांगा-
।।स त्वमग्नि स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यों प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण।।‘
हे मृत्युदेव, आपको स्वर्गप्राप्ति का साधनरुप अग्नि ज्ञात है। आप मुझ श्रद्धालु को भी इसका ज्ञान देंवें। स्वर्गलोक के निवासी इस अमृत तत्व को प्राप्त करते हैं। मुझे यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए किस तरह के कर्मों और यज्ञों को करने की जरूरत है। कृपया मुझे यही दूसरा वर दीजिये।
यमदेव ने नचिकेता के दोनों वरदान पूरे कर दिए। जिज्ञासु नचिकेता पिता की परितुष्टि का वर और अग्नि विज्ञान का वर प्राप्त करने पर आत्मा का यथार्थ स्वरुप् समझाने का तीसरा वर मांगता है।
नचिकेता कहता है –
।।येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीय: ॥
हे यमराज! मृतक व्यक्ति के संबंध में कोई कहता है कि मृत्यु के उपरान्त उसके आत्मा का अस्तित्व रहता है और कोई कहता है कि नहीं रहता। मृत्यु के बाद क्या होता है? क्या आत्मा होती है या नहीं? आत्मा का क्या रहस्य है? कृपया मुझे इसे समझा दें। यह नचिकेता का अभीष्ट और श्रेष्ठ वर है।
नचिकेता ने अपने तीसरे वर में पुनर्मृत्यु ( जन्म-मृत्यु) पर विजय-प्राप्ति का साधन पूछा है। (तृतीयं वृणीष्वेति। पुनर्मृत्योर्मेऽपचितिं ब्रूहि)
एक बालक से ऐसे गूढ प्रश्न की आशा यमदेव को नहीं थी। अतएव यमदेव ने नचिकेता को सच्चा अधिकारी अथवा सुपात्र होने की परीक्षा ली। यमदेव ने देर तक उसे टालने का प्रयत्न किया, किन्तु यह संभव न हो सका।
यमदेव कहते है-
।।देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुवेज्ञेयमणुरेष धर्म:।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम।।
हे नचिकेता! इस विषय में पहले भी देवताओं द्वारा सन्देह किया गया था, क्योकि यह विषय अत्यन्त् सूक्ष्म है और सुगमता से जानने योग्य् नहीं है। तुम कोई अन्य वर मांग लो। मुझ पर बोझ मत डालो। इस आत्मतत्व के ज्ञान संबंधी वर मुझसे मत पूछो।
परंतु नचिकेता बार बार वही प्रश्न पूछता है कि मृत्यु के बाद क्या होता है?’आत्मा का क्या रहस्य है?
यम ने पुनः कहा- ‘यह प्रश्न तुम वापस ले लो। तुम मुझसे और कुछ भी मांग लो। तुम मुझसे राज्य, धन-दौलत, सारे सुख, दुनिया की सारी खुशियां मांग लो, लेकिन यह प्रश्न मत पूछो।’ नचिकेता ने कहा, ‘इन सब का मैं क्या करूंगा? मुझे धन-दौलत देने से क्या लाभ? आप बस मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए।’
यम ने इस सवाल को बार बार टालने की कोशिश करते रहे। वह बोले- ‘देवता भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानते। नचिकेता ने कहा- ‘अगर देवता भी इसका उत्तर नहीं जानते और सिर्फ आप ही जानते हैं, तब आपको ही इसका उत्तर देना होगा।’ नचिकेता ने अपनी जिद नहीं छोड़ी।
ऐसे उच्च जिज्ञासु को अंत में यम ने विस्तार से आत्मा का ज्ञान दिया। उन्होंने नचिकेता को बताया की मृत्यु क्या है? उसका असली रूप क्या है? यमदेव ने नचिकेता को आत्मा का सम्पूर्ण गुढ़ रहस्य बताया।
आत्मा के विषय में गीता में भी लिखा है-
।।वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥
भावार्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।
वेदों के अनुसार जिसने पाप नहीं किया, दूसरो को पीड़ा नहीं पहुँचाई, जो सच्चाई के राह पर चला उसकी मृत्यु कम कष्ट कारक होती है। बहुत ही कम आयु में यमदेव द्वारा यह आत्मतत्व का ज्ञान पाकर पुनः बालक अपने पिता के पास लौट आया। नचिकेता ने आजीवन सत्यधर्म का पालन किया और जीव को ज्ञान का प्रकाश भी दिया।
गायत्री साहू

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