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एन, जी, ओ, महिमा – मार्कण्डेय त्रिपाठी (कवि)

एन, जी, ओ, महिमा

बना लें एन, जी, ओ, हम भी,
बहुत इसमें कमाई है ।
नहीं कोई टैक्स लगता है,
सदा मिलती बधाई है ।।

बहुत सी छूट है इसमें ,
हकीकत किसने जानी है ।
नहीं घाटे का यह सौदा ,
बड़ी अद्भुत कहानी है ।।

समाज सेवा के नामों पर,
मिले अनुदान लाखों में ।
बना लो जितना जी चाहे,
नहीं खटकोगे आंखों में ।।

बहुत से एन, जी, ओ, ऐसे हैं,
जो खेलें करोड़ों में ।
अगर हो जांच इनकी सच,
तो आए दर्द जोड़ों में ।।

गयी है नौकरी यदि अब ,
और व्यापार मंदा है ।
बना लो एन, जी, ओ, प्रिय बंधु,
यह सबसे सफल धंधा है ।।

जिसे देखो वही अब,
एन, जी, ओ, लेकर घूमा करता ।
सेवा के नाम पर लोगों के,
चरणों को चुमा करता ।।

शायद सरकार ने भांपा है,
अब इनकी सच्चाई को ।
बहुत से एन, जी, ओ, ऐसे हैं,
जो अब रोते कमाई को ।।

बहुत से एन, जी, ओ, ऐसे बनें,
जो आज फर्जी हैं ।
चले बस काम कागज़ पर,
करें जो इनकी मर्ज़ी है ।।

देश, विदेश में फैला है,
एन, जी, ओ,का गोरख धंधा ।
बहुत घातक है इनकी सोच,
और व्यवहार है गंदा ।।

तुम ऐसे एन, जी, ओ, से,
सजग रहना,बस यहां धोखा ।
फंसे जो जाल में इनके ,
होगा दूषित लेखा जोखा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी (कवि)

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