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 आपने काजरोलकर का नाम नहीं सुना 

1951 में देश में एक महत्वपूर्ण घटना हुई थी वह था देश का प्रथम लोकसभा चुनाव । इस भाग में पढ़िए मुंबई की नार्थ सेन्ट्रल सीट से बाबासाहेब के चुनाव लड़ने का किस्सा । – शरद कोकास

‘आज़ाद देश’ अब एक शिशु नहीं रहा था । बढ़ते बच्चे की तरह वह वर्ष की चौथी पायदान चढ़ चुका था ৷ आधी रात को मिली आज़ादी के समय मनाये गये उत्सव में जलाई गईं रंगीन बत्तियां लोगों के दिन चढ़े तक सोते रहने की वज़ह से दिन के उजाले में भी जल रही थीं ৷ इस बीच ऐसे कई लोग जो देश की सीधी सादी भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाकर, जन भावनाएँ भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए थे, चाहते थे कि पहली बार मिली स्वतंत्रता के स्वर्गीय सुख में देश की जनता कुछ साल और डूबी रहे ৷ लेकिन इस बीच सब धर्मों की अलग अलग किताबों से ऊपर राष्ट्र धर्म की एक किताब जिसे संविधान कहते हैं देश में लागू की जा चुकी थी ৷ लोग उसे पूज नहीं रहे थे बल्कि पढ़ रहे थे । इस देश का आम आदमी भविष्य में लिखी जाने वाली दुष्यंत की इस काव्य पंक्ति को जी रहा था

*सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर*
*झोले में उसके पास कोई संविधान है ।*

अंतरिम सरकार भी यह सत्य जान गई थी कि इन सरफिरों को यूँही नहीं बहलाया जा सकता इसलिए चार साल बाद ही सही अक्तूबर उन्नीस सौ इक्यावन से फरवरी उन्नीस सौ बावन के बीच चुनाव कराये जाने की घोषणा कर दी गई ৷ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात होने वाले देश के प्रथम लोकसभा चुनाव के लिए जनता का उत्साह कुछ इस तरह था जैसे उन्हें बेटी के लिए वर का चयन करना हो ।

जनतांत्रिक पद्धति से होने वाला यह पहला लोक सभा चुनाव सभी के लिए उत्सुकता का विषय था ৷ हमारा देश इस पहले लोकसभा चुनाव में विश्व के विभिन्न देशों की तरह सार्वजनीन वयस्क मताधिकार पद्धति अपना कर जनतंत्र की राह पर आगे बढ़ने हेतु कदम रख चुका था ৷ इससे पूर्व एक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था जिसे इस चुनाव में संविधान के अनुसार एक वोट तक सीमित करना था ৷

बाबासाहेब आंबेडकर संविधान निर्माण हेतु बनाई गई ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे ৷ संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका एवं महत्ता साबित हो चुकी थी इसलिए नेहरू जी की इच्छा थी कि बाबासाहेब कांग्रेस की सीट पर यह चुनाव लड़ें ৷ बाबासाहेब ने उनकी इच्छा का सम्मान अवश्य किया लेकिन वे सिद्धांतवादी थे, उन्होंने कोई समझौता नहीं किया न ही कोई प्रलोभन उन्हें भटका सका ৷ उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए गठित अपनी पार्टी शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से ही चुनाव लड़ना तय किया ৷ सन उन्नीस सौ बयालीस में स्थापित इस फेडरेशन के वे संस्थापक थे ৷

उन्होंने मुंबई के उत्तर मध्य क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी प्रारंभ की ৷ बाबासाहेब आंबेडकर के विरुद्ध सी पी आई, हिन्दू महासभा के प्रत्याशियों के अलावा कांग्रेस से नारायण सदाशिव काजरोलकर प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे ৷ मज़े की बात यह कि काजरोलकर बाबासाहेब आंबेडकर के ही शिष्य थे लेकिन इस वक्त वे कांग्रेस द्वारा गोद लिए जा चुके थे ৷ राजनीति के ओलम्पिक में कूटनीति के कुछ नए खेल शामिल किये जा रहे थे । फिर भी बाबासाहेब को इस बात की आश्वस्ति थी कि देश की तरह मुंबई की तमाम जनता भी उनके साथ है जिसकी अस्मिता के लिए वे हमेशा से लड़ते आये हैं ৷ उन्होंने मुंबई नार्थ सेंट्रल से चुनाव लड़ना तय किया जो बाहर से आये पंजाबी, सिन्धी, तमिल के अलावा स्थानीय निम्न , मध्य वर्ग और गरीबों की बस्ती थी .

लेकिन उन्हें ज्ञात नहीं था कि चुनाव तो षडयंत्रों की पाठशाला होती है जिसका प्रथम सत्र इसी प्रथम चुनाव से प्रारंभ होने जा रहा था ৷ आगे की कक्षाओं में पढाया जाने वाला बूथ कैप्चरिंग,ई वी एम मैनेजमेंट , हॉर्स ट्रेडिंग इत्यादी का पाठ्यक्रम अभी तैयार नहीं हुआ था ।

बाबासाहेब की विचारधारा और सिद्धांतों का सम्मान करने के बावजूद उनके पक्ष में कोई नहीं था ৷ लेकिन वे अकेले नहीं थे, आचार्य कृपलानी के साथी ,समाजवादी विचारधारा के प्रणेता अशोक मेहता प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों के साथ उनके पक्ष में खड़े थे ৷ इस चुनाव में प्रथम चुनाव आयुक्त के रूप में सुकुमार सेन की नियुक्ति हुई थी ৷ यह देश का बहुत महत्वपूर्ण चुनाव था इसलिए कि इस चुनाव से एक ऐसी परम्परा स्थापित होने जा रही थी जिस पर सम्पूर्ण देश का भविष्य टिका हुआ था ৷

नियत तिथियों पर पूरे देश में यह चुनाव धूमधाम से संपन्न हुआ ৷ देश की जनता के लिए मताधिकार का यह पहला अवसर था ৷ सत्रह करोड़ साठ लाख मतदाताओं में से दस करोड़ सत्तर लाख मतदाताओं ने अर्थात साठ प्रतिशत मतदाताओं ने इस चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग किया ৷

राजनीति की बाज़ी शतरंज की तरह होती है वह कभी भी किसी ओर पलट सकती है । मुंबई में इस चुनाव की बहुत धूम मची लेकिन अंततः दिल्ली मुंबई पर हावी रही । तमाम कोशिशों के बावजूद बाबासाहेब यह चुनाव हार गए ৷ यह चुनाव कांग्रेस के नारायण सदोबा काजरोलकर ने जीता और इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया ৷ बाबासाहेब आंबेडकर चौथे स्थान पर रहे ৷

मुंबई की इस हार से बाबासाहेब आंबेडकर विचलित नहीं हुए थे ৷ वे जानते थे संसद में उनके लिए कुर्सी भले न हो लेकिन लोगों के दिलों में उनके लिए बहुत जगह थी और आनेवाली कई सदियों तक उस पद से उन्हें कोई हटा नहीं सकता था, मनुष्य के सुख,उसकी अस्मिता और गौरव के लिए लड़ने वाले इस शख्स को कोई हरा नहीं सकता था । नेहरू जी भी उन्हें खोना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से उनके सरकार में आने की व्यवस्था कर दी । लेकिन जनता के प्रतिनिधि के रूप में सरकार में आने का महत्त्व तब भी था और आज भी है और फिर बाबासाहेब तो देश की असंख्य जनता के चहेते थे इसलिए जैसे ही मध्य प्रांत के भंडारा ज़िले में लोकसभा सदस्य की मृत्यु के पश्चात वह सीट खाली हुई बाबासाहेब ने भंडारा सीट से चुनाव लड़ने का निर्णय कर लिया ৷

मुंबई का यह चुनाव इतिहास में सदा याद रखा जायेगा । काजरोलकर को आज कोई नहीं जानता लेकिन मुंबई की एक प्रमुख सड़क है, डॉ.आंबेडकर मार्ग जो नार्थ मुंबई से शुरू होकर अक्खा मुंबई पार करते हुए दक्षिण मुंबई तक जाती है । ऐसी सड़कें पूरे देश में हैं।

शरद कोकास

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