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असर इश्क़ का

 

रस्म-ए-उल्फ़त निभाना उन्हें आ गया।
बेवज़ह मुस्कुराना उन्हें आ गया।।

ज़ख़्म काँटों से मिलता ख़बर थी उन्हें।
फूल से चोट खाना उन्हें आ गया।।

पहले महफ़िल में आते थे ख़ामोश ही।
साज़ पे गीत गाना उन्हें आ गया।।

मैक़दे में रहे होश खोया नहीं।
बिन पिये झूम जाना उन्हें आ गया।।

राज़-ए-दिल अब तलक हमपे ज़ाहिर न हो।
अब निगाहें चुराना उन्हें आ गया।।

“रस्म-ए-उल्फ़त- प्रीत की रीत
“आईने में चाँद” ग़ज़ल संग्रह”

डॉ.फूलकली पूनम
शायरा, कवयित्री
व्हाइट हाउस अमेठी
उ.प्र., भारत

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